संपादकीय

The Challenge of the Debate on SIR : एसआईआर पर बहस की चुनौती

कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन ने एसआईआर (The Challenge of the Debate on SIR) के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इस मुद्दे को लेकर उसने नई दिल्ली के रामलीला मैदान में महारैली भी कर ली जिसका नतीजा ढाक के तीन पात निकला। लाखों की भीड़ जुटाने के दावे हवा हवाई सिद्ध हुए। इसके बावजूद विपक्ष एसआईआर की प्रक्रिया को रोकने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से त्यागपत्र की मांग पर अड़ा हुआ है। दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस पर देश में अराजकता फैलाने का आरोप लगा रही है।

इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली बहस की चुनौती दे दी है और कहा है कि वे प्रधानमंत्री के साथ मीडिया के सामने हर विषय पर बहस के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री जिसे चाहें उसे जज बना लें चाहें तो राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत को जज बना लें। बहस के बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि कौन देशद्रोही है? राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर यह भी आरोप लगाया है कि वे विदेशी ताकतों के सहयोग से ही प्रधानमंत्री बने हैं और अभी भी बने हुए हैं। राहुल गांधी के इस वार पर पलटवार करते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि सरकार कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के साथ किसी भी मुद्दे पर सार्थक चर्चा के लिए तैयार है क्योंकि हमारे पास छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है।

अमित शाह ने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा है कि उसने माक पार्लियामेंट चलाकर लोकतंत्र का मजाक उड़ाया है। यदि उसे एसआईआर (The Challenge of the Debate on SIR) पर चर्चा ही करनी है तो वह असली संसद में आए। राहुल गांधी विपक्ष के नेता हैं इस नाते वे संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर सकते हैं। यदि वे चाहेंगे तो सरकार संसद का विशेष सत्र आहूत करने और उसमें हर विषय पर चर्चा करने के लिए तैयार है। अमित शाह का कहना सही है कि इन मुद्दों पर संसद में चर्चा होने चाहिए क्योंकि वहीं से समाधान का रास्ता निकलेगा। सड़क पर उतर कर तमाशा करने से कुछ हासिल नहीं होगा किंतु संसद सत्र के दौरान तो विपक्ष चर्चा से भाग जाता है और संसद परिसर में राजनीतिक नौटंकी करने लगता है।

संसद के जिस सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई न करने का कानून पारित किया गया था तब भी विपक्ष सदन से नदारद था और अब उनके नाम पर हायतौबा मचा रहा है। उस समय एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी एकमात्र ऐसे विपक्षी नेता थे जो मुख्य चुनाव आयुक्त को किसी भी तरह की कार्यवाही के दायरे से बाहर करने वाले प्रावधान के खिलाफ जमकर गरजे थे और कहा था कि जब प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है तो मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती। उस समय विपक्ष सदन में होता और ओवैसी के सुर में सुर मिलाते हुए इसका कड़ा विरोध करता तो कुछ बात बनती।

अब जबकि चिडिय़ा खेत चुग गई है तो पछतावे के अलावा और क्या हाथ आएगा? रही बात राहुल गांधी के इस आरोप की कि पीएम मोदी विदेशी मदद और विदेशी फंडिंग से प्रधानमंत्री बने हैं तो ऐसा कहकर उन्होंने आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ कर ली है। मोदी सरकार ही है जो विदेशी फंडिंग रोकने के लिए एफसीआर (The Challenge of the Debate on SIR) कानून ला रही है जिसका कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां प्रबल विरोध कर रही हैं। फिर भी कांग्रेस को इन विषयों पर चर्चा करनी ही है तो उसे संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग करनी चाहिए जिसके लिए गृहमंत्री अमित शाह के मुताबिक सरकार तैयार है।

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