विशेष आलेख

सफल रैली की कमियां/खामियां, आगाज है या अंजाम?

राजीव खंडेलवाल

एक नवंबर की बहुचर्चित ‘‘वोट बचाओ, देश बचाओ’’ मार्च-रैली (Shortcomings/flaws in a successful rally: a beginning or an end?) को उदार दृष्टिकोण से देखें तो भले ही वह ‘‘महारैली’’ अथवा ‘‘रैला’’ का स्वरूप न ले पाई हो, तब भी यदि ‘‘सफलतम नहीं तो सफल’’जरूर रही। लेकिन लगातार 10 लाख से अधिक व्यक्तियों को शामिल होने का दावा तो मजाक ही बन गया।
इसीलिए आयोजकगण, जहां इस रैली को ऐतिहासिक सफलतम बता रहे हैं, वही विरोधी अर्थात सत्तारूढ़ भाजपा इसको ‘‘ असफल दिखाने का असफल प्रयास कर’’ रही है, जिसके लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस तक भाजपा प्रवक्ताओं ने की। देश में सत्तारूढ़़ दल के खिलाफ कितनी रैलियां हुई हैं, लेकिन कभी सत्तारूढ़ दल ने वर्तमान समान पत्रकार वार्ता आयोजित कर संख्या की दृष्टि से असफल बताने का प्रयास किया क्या? शायद नहीं! इससे ही रैली की सफलता, महत्ता व प्रभाव को समझा जा सकता है।


एक आकलन
इस रैली में ‘‘विविधता में एकता’’ जरूर दिखी। भले ही वह “कश्मीर से कन्याकुमारी” तक का स्वरूप न ले पाई। लगभग 1 किलोमीटर लम्बे बैनर पर एफआईआर में हटाये गये 50 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम छाप कर रैली के उद्देश्य को साक्ष्य के साथ सार्थक बनाने का प्रयास किया गया।
कहा जाता है; “अपनी खिचड़ी को कोई खाली नहीं बताता।” आयोजक कभी भी अपनी रैली की सफलता के साथ कमियों को नहीं गिनते है और न ही गिनाते हैं। शायद ‘‘सफलता’’ उसे कमियों की ओर जाने का रास्ता भी नहीं देती है। बावजूद इसके यदि सफल से सफलतम स्थिति की ओर जाना है, 2029 के लक्ष्य की प्राप्ति करना है, तो निश्चित रूप से आपको अपने हर कार्य के परिणाम पर अंदरखाने से भी झांकना होगा। तभी आप यह तय कर पाएंगे कि आगे इससे अच्छा और क्या कर सकते हैं, जो इस बार नहीं कर पाए। लेकिन वर्तमान आयोजक गणों से इस सोच की उम्मीद करना ‘‘मुंगेरीलाल का सपना’’ देखने जैसा ही होगा।


कमियां
21 पार्टियां मतलब पूरा इंडिया गठबंधन के साथ सिविल सोसाइटी और गठबंधन के बाहर की कुछ और संगठन के शामिल होने से बड़ा जमावड़ा होने के बावजूद कुछ प्रमुख पार्टियां इसमें शामिल नहीं थी। फलस्वरूप वर्ष 1974 में जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय जो ‘‘कांग्रेस विरुद्ध सब (ऑल )’’ बनी स्थिति जैसी इस समय ‘‘भाजपा विरुद्ध ऑल’’ नहीं बन पाई। प्रमुख पार्टियां जो एनडीए का भी हिस्सा नहीं है, इस रैली में शामिल नहीं हुई, वे है-


राहुल गांधी जवाब दें?
इस रैली में एक सवाल अनुत्तरित है। इसमें कार्यकर्ताओं ज्यादा थे अथवा आम नागरिक? उनका अनुपात क्या था? यदि राहुल गांधी यह दावा करते है कि आम नागरिक ज्यादा आये, जैसा उन्होंने भाषण में कथन भी किया, तो उसका एक अर्थ यह निकलता है कि पार्टी संगठन आज भी कमजोर है और कार्यकर्ताओं ने वह आवश्यक जोश, गति से भागीदारी नहीं की। लेकिन यदि कार्यकर्ताओं की भागीदारी ज्यादा थी, तब भी आत्मावलोकन, आत्ममंथन करना होगा कि बिना आम जनता की भागीदारी के 2029 के तय किये गोल पोस्ट कैसे प्राप्त कर सकते है?
याद कीजिए! काॅकरोच जनता पार्टी का जंतर-मंतर का आंदोलन, बिना संगठन के था, लेकिन जनता खड़ी हो गई और आंदोलन सफल होकर शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इससे सीख लेने की आवश्यकता है।


तीसरी बात निश्चित रूप से इस आंदोलन से पैदा हुई उर्जा को सहेज कर समय-समय पर जनता के बीच प्रसारित और वितरित करने का कार्य संगठन व कार्यकर्ताओं के बल पर ही नेतृत्व कर सकता है। इसलिए प्रत्येक पार्टी को अपने संगठनात्मक ढ़ाचे को मजबूत करने की आवश्यकता है। यह सीख भारतीय जनता पाटी व संघ से सीख सकते हैं, जिनकी संगठन क्षमता को समय-समय पर विपक्षियों ने भी सराहा है।
भाजपा गलत गोल पोस्ट तय कर रही है।


वर्तमान में, पिछले चार महीनों से खासकर कॉकरोच जनता पार्टी के उभार के बाद भाजपा अपना गोल पोस्ट (एजेंडा) तय नहीं कर पा रही, जिसमें उसे महारत हासिल थी। वे अपने तय गोल पोस्ट पर अभी तक कांग्रेस को घुमाया करते थे। लेकिन आज न तो भाजपा गोल पोस्ट तय कर पा रही है और जो तय कर रही है, वह गलत होकर असफल हो रही है। क्या अपने ही बुने जाल में उलझ रही है? उदाहरण नॉर्थ
1984 के दंगे के सिख समुदाय की भावनाओं को उभारने के लिए सिख समुदाय और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर श्रद्धांजलि पद यात्रा न भूले हैं, न भूलेंगे के नारे के साथ, इंडिया ब्लॉक के रैली के समानांतर की। दुर्भाग्य से आश्चर्यजनक रूप से इसका नेतृत्व वे सिख ‘‘बदनाम’’ मंत्री हरदीप सिंह पुरी कर रहे थे, जो खुद 2019 के लोकसभा चुनाव में सिखों के आस्था का केंद्र पवित्र स्वर्ण मंदिर स्थित अमृतसर से कांग्रेस के उम्मीदवार से लगभग 1 लाख वोटों से हार गये थे। इसी प्रकार दिल्ली के वर्तमान उप राज्यपाल सरदार तरनजीत सिंह संधू 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी अमृतसर सीट से तीसरे स्थान पर रहकर बुरी तरह से हारे। मतलब सिख सेंटीमेंट का मुद्दा जो कांग्रेस के खिलाफ चलाना चाहते है, उस प्रतीक की सिख समुदाय में राजनीतिक स्वीकारिता को तो ध्यान में रखना चाहिए था? आखिर उसे हासिल क्या हुआ?


‘ पात्रा’’ हंसी का ‘‘पात्र’’ क्यों बन रहे हैं?
एक नवम्बर की रैली को असफल दिखाने के लिए भाजपा प्रवक्ता एवं सांसद संबित पात्रा ने बाकायदा प्रेस वार्ता तक कर डाली। उन्होंने आयोजन स्थल में अधिकतम कितने व्यक्ति इक्ठ्ठा हो सकते है, की बहुत ही वैज्ञानिक गणना की।
मैदान का कुल क्षेत्रफल (10-12 एकड़)।
मंच ‘डी’ एनक्लोजर कितना प्रतिशत जगह घेर रहा है (लगभग 15%)।
40%हिस्सा पूरी तरह खाली था।
28,000, कुर्सियां लगाई गई।
(5,000-7,000), खाली थी।
मतलब अधिकतम (25,000) की उपस्थिति संभव हो सकती थी है। आयोजकों के अनुसार रामलीला ग्राउंड पर 35-40 हजार व्यक्ति हो सकते हैं। अतः उक्त गणना बहुत ही गलत तो नहीं है। लेकिन संबित पात्रा ने जो वीडियो दिखा कर नैरेटिव बनाने का प्रयास किया, निश्चित रूप से वह हास्यास्पद था। सोशल मीडिया में सैकड़ों वीडियो उक्त दावे को झुठला रहे हैं। मतलब उक्त वीडियो का बताया गया समय गलत है। खाली कुर्सी का एक बडा कारण कीचड़ व पानी का होना है।


क्या चित्रा त्रिपाठी माफी मांगेगी?
रैली के एक दिन पूर्व एबीपी न्यूज के रात्रि 09 बजे कार्यक्रम ‘जनहित’ में चित्रा त्रिपाठी ने थंबनेल लगाया- ‘‘
1 नवंबर की डेट!अराजकता सेट’ ’
क्या चित्रा त्रिपाठी भूल गई है कि पुलिस ने इस रैली की इजाजत दी थी? मतलब क्या पुलिस भी अराजकता फैला रही है? रैली के पूर्व ही उक्त शीर्षक की कड़ी आलोचना हुई। पूरे देश से चलकर दिल्ली में भाग लेने वाले व्यक्तियों के साथ कहीं भी कोई घटना नहीं हुई। मतलब रैली शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गई । सिर्फ एक सिपाही का एक आंदोलनकारी के साथ हुई हल्का सा विवाद का वीडियो आया। आखिर चित्रा त्रिपाठी के अराजकता फैलाने वाले नरेटिव को शांतिप्रिय जनता ने नकार दिया। निश्चित रूप से चित्रा त्रिपाठी को माफी मांगनी चाहिए। वैसे चित्रा त्रिपाठी पूर्व में भी कई बार माफी मांगने लायक कार्य कर चुकी हैं।


निष्कर्ष
क्या रैली की सफलता आंदोलन में बदलेगी? संगठन में मजबूती आएगी? अथवा कुछ समय पश्चात यह भी राजनीतिक स्मृतियों का हिस्सा बनकर रह जाएगी? कुछ इंतजार करना होगा, क्योंकि होनहार बिरवान के होत चिकने पात।

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