Payment Dispute: अमृत मिशन के ₹1.07 करोड़ भुगतान की याचिका खारिज
बिलासपुर। अमृत मिशन के तहत किए गए कार्यों के भुगतान विवाद (Payment Dispute) में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नागपुर की एक कंसल्टिंग इंजीनियरिंग फर्म को राहत देने से इन्कार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) से जुड़े ऐसे विवाद, जिनमें तथ्यों और साक्ष्यों की विस्तृत जांच आवश्यक हो, उनका निराकरण संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों के लिए सक्षम सिविल कोर्ट या मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का रास्ता अपनाना होगा।
याचिकाकर्ता फर्म ‘पुरानिक ब्रदर्स कंसल्टिंग इंजीनियर्स’ के प्रोपराइटर नितिन पुरुषोत्तम पुरानिक ने दुर्ग जिले की कुम्हारी नगर पालिका द्वारा अमृत मिशन के तहत एकीकृत जल संवर्धन परियोजना और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए तैयार की गई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) एवं प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी का कार्य किया था। नगर पालिका ने 18 नवंबर 2020 को वर्क ऑर्डर जारी किया था। फर्म ने करीब दो वर्षों तक कार्य करने के बाद समय-समय पर रनिंग बिल प्रस्तुत किए, लेकिन नगर पालिका ने फंड आबंटित नहीं होने का हवाला देकर भुगतान रोक दिया। बाद में एक मार्च 2024 को राज्य सरकार और सूडा से स्वीकृति नहीं मिलने का कारण बताते हुए वर्क ऑर्डर भी निरस्त कर दिया।
फर्म ने अदालत में बताया कि उसकी 84.55 लाख रुपये कंसल्टेंसी फीस और 22.91 लाख रुपये डीपीआर की राशि सहित कुल 1.07 करोड़ रुपये के भुगतान विवाद (Payment Dispute) का निपटारा नहीं किया गया है।
दोनों पक्षों ने रखे अपने-अपने तर्क Payment Dispute
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ दुबे ने दलील दी कि फर्म ने वैध अनुबंध के तहत पूरी सेवाएं दी हैं और विभागीय पत्रों से भी यह स्पष्ट है कि भुगतान योग्य राशि निर्विवाद है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ‘सूर्या कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि सरकार या उसकी एजेंसियां वित्तीय संकट का बहाना बनाकर स्वीकृत भुगतान अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकतीं।
वहीं राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण दास तथा नगर पालिका कुम्हारी की ओर से अधिवक्ता धीरज वानखेड़े ने कहा कि यह विशुद्ध रूप से व्यावसायिक अनुबंध का मामला है। संविदा विवाद (Payment Dispute) में यह तय करना होगा कि कितना कार्य हुआ, अनुबंध की शर्तों का पालन हुआ या नहीं। ऐसे विवादों का निपटारा रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ग्रिडको बनाम सुकामनी दास तथा यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पुना हिंडा जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविदात्मक मामलों में हाई कोर्ट को अनुच्छेद-226 के तहत हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि केवल ‘आवेदन पर निर्णय लेने’ का निर्देश मांगने से विवाद की प्रकृति नहीं बदल जाती। मूल विवाद अनुबंध से जुड़ा है, इसलिए उसका समाधान उचित वैधानिक मंच पर ही किया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत ‘सूर्या कंस्ट्रक्शंस’ का मामला वर्तमान प्रकरण से भिन्न है, क्योंकि यहां विभागीय स्वीकृतियों और अन्य तथ्यों को लेकर विवाद मौजूद है।
अन्य कानूनी मंच पर जाने की छूट
भुगतान विवाद (Payment Dispute) पर सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका को मेरिटहीन मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह अपने बकाया की वसूली के लिए कानून के तहत उपलब्ध अन्य सक्षम कानूनी मंच, जैसे सिविल कोर्ट या मध्यस्थता, का सहारा ले सकता है। इस मामले में किसी भी पक्ष पर अदालती खर्च नहीं लगाया गया।



