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Natural Farming : रासायनिक खेती छोड़ इस किसान ने अपनाया नया रास्ता, गोबर और गोमूत्र से बढ़ा मुनाफा

नई दिल्ली। खेती में बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच अब कई किसान प्राकृतिक तरीकों (Natural Farming) की ओर लौट रहे हैं। कम खर्च में बेहतर उत्पादन देने वाली खेती की यह पद्धति किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। गुजरात के एक किसान ने भी इसी बदलाव को अपनाकर अपनी खेती की तस्वीर बदल दी है।

प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन मिलने के बाद किसान ने रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया। अब वह देसी गाय से तैयार जैविक संसाधनों के सहारे खेती कर रहे हैं और पहले की तुलना में बेहतर आमदनी हासिल कर रहे हैं।

गोबर और गोमूत्र से तैयार करते हैं प्राकृतिक खाद Natural Farming

गुजरात के दाहोद जिले के किसान नरेंद्रभाई हटिला कई वर्षों से गाय आधारित प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वे देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत और घन जीवामृत का उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि इससे खेती की लागत कम हुई है और मिट्टी की उर्वरता में भी लगातार सुधार देखने को मिला है। उनके अनुसार एक देसी गाय की मदद से लगभग 30 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा सकती है।

पांच परत वाले मॉडल से बढ़ी आय

प्रशिक्षण मिलने के बाद नरेंद्रभाई ने अपने खेत में पांच परत वाला मॉडल फार्म विकसित किया। इसमें फल, सब्जियां और बागवानी फसलों की खेती की जाती है। इन फसलों में रासायनिक खाद और दवाओं का उपयोग नहीं किया जाता। प्राकृतिक तरीके अपनाने से उत्पादन के साथ उनकी आमदनी में भी बढ़ोतरी हुई है।

किसानों को मिल रही सरकारी सहायता

कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी परियोजना के तहत प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता (Natural Farming) दी जा रही है। धनपुर क्षेत्र में गाय आधारित प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को हर वर्ष 10 हजार 800 रुपये की आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। इसके साथ ही जीवामृत, घन जीवामृत, अग्नि अस्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे प्राकृतिक उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

टिकाऊ खेती का बन रहा विकल्प

विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती से खेती की लागत घटती है, मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। यही कारण है कि यह मॉडल अब अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है और आने वाले समय में इसे टिकाऊ खेती के प्रभावी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

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