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Russia Oil : रूस से तेल खरीदने पर क्या भारत पर बढ़ेगा दबाव, अमेरिकी सीनेट के नए प्रस्ताव ने बढ़ाई चिंता

रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज (Russia Oil) हो गई है। अमेरिका में पेश किए गए एक नए प्रस्ताव ने उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जो अब भी रूस से बड़ी मात्रा में तेल आयात कर रहे हैं। इस प्रस्ताव में भारत का नाम भी शामिल होने से व्यापार जगत की नजरें इस घटनाक्रम पर टिक गई हैं।

हालांकि अभी यह केवल एक विधेयक का प्रस्ताव है और इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी संसद की पूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके बावजूद यदि यह आगे बढ़ता है तो भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है।

किन देशों पर है 100 प्रतिशत शुल्क का प्रस्ताव Russia Oil

अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए प्रस्ताव के अनुसार भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों से आने वाले आयात पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की बात कही गई है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि ये देश रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहे हैं, जिससे रूस को आर्थिक मदद मिल रही है।

रूस पर दबाव बढ़ाने की तैयारी

प्रस्ताव का उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना बताया गया है। इसमें रूस के राजनीतिक नेतृत्व, वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने वाले नेटवर्क पर भी कड़े कदम उठाने की सिफारिश की गई है। अमेरिकी सांसदों का मानना है कि इससे रूस की आय प्रभावित होगी और उस पर युद्ध समाप्त करने का दबाव बढ़ेगा।

कुछ यूरोपीय देशों को राहत

प्रस्ताव में कुछ यूरोपीय देशों को राहत देने की भी बात कही गई है। जिन देशों की रूस से प्राकृतिक गैस की खरीद सीमित है और जो अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं, उन्हें इस अतिरिक्त शुल्क से छूट देने का सुझाव रखा गया है।

हर छह महीने होगी समीक्षा Russia Oil

प्रस्ताव के अनुसार अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि हर 180 दिन में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों की समीक्षा करेंगे। यदि किसी देश की खरीद में बदलाव होता है तो उसके आधार पर शुल्क की दरों में संशोधन भी किया जा सकता है।

भारत पर क्या हो सकता है असर

यदि यह प्रस्ताव भविष्य में कानून का रूप लेता है तो भारत से अमेरिका निर्यात होने वाले कई उत्पादों पर अतिरिक्त (Russia Oil) शुल्क लग सकता है। इससे भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ने और कुछ क्षेत्रों में व्यापार प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि फिलहाल यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है और इसके लागू होने से पहले कई स्तरों पर मंजूरी मिलना जरूरी होगा।

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