छत्तीसगढ़

एम्स की ओपीडी में रोज 4 हजार मरीज, जांच के लिए तीन-चार महीने का इंतजार

रायपुर। राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर रोजाना करीब 4 हजार मरीज ओपीडी पहुंच रहे हैं। मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले जांच और उपचार की सुविधाएं सीमित होने से परेशानी बढ़ती जा रही है। स्थिति यह है कि ओपीडी में डॉक्टर को दिखाने के बाद सोनोग्राफी, सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य जरूरी जांच के लिए मरीजों को कई बार तीन-तीन महीने बाद की तारीख मिल रही है। वहीं कैंसर की पहचान और उपचार की दिशा तय करने में अहम पैट-सीटी जांच के लिए करीब चार महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है।

एम्स में आने वाले मरीजों को पहले ओपीडी पर्ची, फिर चिकित्सकीय जांच और उसके बाद रेडियोलॉजी व पैथोलॉजी जांच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। मरीजों की संख्या अधिक होने के कारण पूरी प्रक्रिया में समय लग रहा है। सामान्य बीमारी वाले मरीज तो किसी तरह इंतजार कर लेते हैं, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए लंबी प्रतीक्षा परेशानी का कारण बन रही है। ऐसे मरीजों के सामने कई बार निजी अस्पताल में जांच कराने का विकल्प बचता है, जहां जांच पर कई गुना अधिक खर्च करना पड़ता है।

पैट-सीटी की क्षमता सीमित, मरीज ज्यादा

सरकारी क्षेत्र में पैट-सीटी जांच की सुविधा राज्य में एम्स में उपलब्ध है। यहां इस जांच के लिए करीब 7 हजार रुपए शुल्क लिया जाता है। निजी अस्पतालों में यही जांच करीब 21 हजार रुपए तक में होने की बात सामने आई है। एम्स में पैट-सीटी की प्रतिदिन जांच क्षमता करीब 3 से 5 मरीज की बताई गई है, जबकि जरूरतमंद मरीजों की संख्या करीब 50 तक पहुंच रही है। ऐसे में जांच के लिए प्रतीक्षा सूची लंबी हो जाती है। कैंसर के मरीजों के लिए यह देरी उपचार शुरू करने में भी बाधा बन सकती है।

ओपीडी में उसी दिन जांच भी मुश्किल

एम्स की ओपीडी में रोजाना करीब 4 हजार मरीज पहुंच रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में मरीजों की वजह से सभी की उसी दिन डॉक्टर से जांच होना भी मुश्किल हो रहा है। ओपीडी के बाद जिन मरीजों को रेडियोलॉजी या अन्य जांच की जरूरत होती है, उन्हें उपलब्ध स्लॉट के अनुसार तारीख दी जाती है। इससे उपचार की प्रक्रिया आगे बढ़ने में समय लग रहा है।

मरीजों का बढ़ता भरोसा भी वजह

एम्स के पीआरओ डॉ. मृत्युंजय राठौर के अनुसार, बड़ी संख्या में मरीजों का संस्थान पहुंचना एम्स पर लोगों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। प्रतीक्षा समय कम करने के लिए विभागवार प्रक्रियाओं की नियमित समीक्षा की जा रही है। गंभीर और आपातकालीन मरीजों को चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार प्राथमिकता दी जाती है। उनका कहना है कि सर्दी, खांसी और बुखार जैसी सामान्य बीमारियों के मरीज भी बड़ी संख्या में एम्स पहुंचते हैं, जबकि इनका उपचार जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में किया जा सकता है। मरीजों को लौटाया नहीं जा सकता, इसलिए ओपीडी में भीड़ बढ़ती है। जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने से एम्स में गंभीर मरीजों के लिए संसाधन और समय उपलब्ध कराया जा सकता है।

इमरजेंसी में शुरुआती इलाज के बाद रेफर

एम्स में गंभीर स्थिति में पहुंचने वाले मरीजों को प्राथमिक उपचार और हालत स्थिर होने के बाद जरूरत के अनुसार आंबेडकर अस्पताल और डीके अस्पताल रेफर किया जाता है। एम्स में इमरजेंसी एवं ट्रॉमा यूनिट के विस्तार के लिए 150 बेड की क्रिटिकल केयर यूनिट तैयार की जा रही है। इसके पूरा होने में अभी करीब एक वर्ष लगने की संभावना है। वर्तमान में रेफर किए जाने वाले मरीजों की पर्ची में कई मामलों में बेड उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख किया जाता है।

सुविधाओं के विस्तार की जरूरत

मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एम्स में जांच और उपचार की सुविधाओं के विस्तार की जरूरत महसूस की जा रही है। विशेष रूप से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की जांच में लंबी प्रतीक्षा मरीज और परिजनों की चिंता बढ़ा रही है। पैट-सीटी समेत अन्य जांच सुविधाओं की क्षमता बढ़ने से प्रतीक्षा समय कम किया जा सकता है। साथ ही जिला अस्पतालों और अन्य सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाएं बढ़ाने से सामान्य मरीजों का दबाव भी कम किया जा सकता है।

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