संपादकीय

Growing discord over Gyanesh: ज्ञानेश को लेकर बढ़ता क्लेश

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सियासी क्लेश बढ़ता ही जा रहा है। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व में इंडी गठबंधन ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी तथा कॉकरोच जनता पार्टी भी आंदोलित हैं। इन धरना, प्रदर्शन और रैली का मुख्य केन्द्र देश की राजधानी नई दिल्ली बनी हुई है। जहां पिछले एक सप्ताह से धरना प्रदर्शन हो रहा है। नतीजतन नई दिल्ली के बाशिंदों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

मुख्य मार्गों को बेरिकेड्स लगाकर रोकने से लोगों को अनावश्यक रुप से लंबा रास्ता तय करके गंतव्य पर पहुंचने भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। जगह-जगह मीलों लंबे जाम से भी लोग हलाकान हो रहे हैं। पानी पी पीकर प्रदर्शनकारियों को कोस रहे हैं। सबसे ज्यादा नुकसान व्यापारियों को हो रहा है। त्यौहारी सीजन शुरू हो गया है लेकिन इन विरोध प्रदर्शन के चलते उनका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। एक सप्ताह से चल रहे धरना प्रदर्शन के कारण नई दिल्ली में अब तक तीन सौ करोड़ रुपये का व्यवसाय प्रभावित हो चुका है। यदि यह आंदोलन और लंबा चला तो बहुत से व्यापारियों का दीपावली में दीवाला निकल जाएगा। बार बार मेट्रो स्टेशन बंद करने और यात्री ट्रेनें रद्द करने से भी कामकाजी दैनिक रेलयात्रियों को भारी मुसीबत हो रही है।

आंदोलन के मद्देनजर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती और उनके द्वारा जगह जगह पूछताछ करने तथा रोकने टोकने के कारण भी जन जीवन अस्त व्यसत हो रहा है। किंतु आंदोलनकारियों को दिल्ली के (Growing discord over Gyanesh) बाशिंदों के दुख दर्द से कोई सरोकार नहीं उन्हें तो बस अपनी राजनीति चमकानी है। लोग उठाते रहें परेशानी उनकी बला से। यह ठीक है कि अपनी मांगों को लेकर राजनीतिक दलों को ही नहीं बल्कि हर संगठन और हर व्यक्ति को आंदोलन करने का अधिकार है लेकिन आम जनता को भी तो चैन से रहने का अधिकार है। जिसकी आंदोलनजीवी अनदेखी करते हैं। ऐसे वे लोगों की सहानुभूति खो देते हैं। आंदोलन के नाम पर सड़क जाम करना। पुलिस पर हमला करना।

गाली बकना यह सब आंदोलन की धार को ही कुंद करता है। रही बात एफआईआर की प्रक्रिया को रोकने, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और ईवीएम की जगह फिर से बैलेट पेपर से चुनाव संबंधी मांगों की तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। उसके फैसले का इंतजार करना चाहिए। सड़क पर उतरने की जगह संसद में यह मामला उठना चाहिए। जो इसके लिए सही मंच है। यदि सड़क ही सब कुछ तय करने लगी तो फिर संसद की क्या जरूरत रह जाएगी? विपक्ष को यह बात समझनी चाहिए और अपने आंदोलन को अराजक होने से बचाना चाहिए। अन्यथा इसके गंभीर परिणाम उन्हें ही आने वाले समय में भुगतना पड़ सकता है। ज्ञानेश को लेकर मचे सियासी क्लेश का और इस अनिश्चितकालीन आंदोलन का समाप्त होना जरूरी है।

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