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Supreme Court on Forests Preservation : देशभर में वनों को बचाने की सख्त जरूरत : सुप्रीम कोर्ट

देश में लगातार असंतुलित हो रहे पर्यावरण और सिमटते जंगलों को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देशव्यापी परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण संरक्षण की वकालत करते हुए कहा कि आज पूरे भारत में वनों को युद्ध स्तर पर बचाने की सख्त जरूरत है। अदालत ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि झारखंड जैसे देश के कुछ चुनिंदा राज्य ऐसे हैं, जिनके पास अब भी बेहद समृद्ध और दुर्लभ प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Natural Ecosystem) मौजूद है, जिसे हर हाल में सहेजकर और सुरक्षित रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) द्वारा दायर की गई एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने जेएसपीसीबी की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता को सीधे संबोधित करते हुए कहा, “भारत में अब ऐसे गिने-चुने राज्य ही बचे हैं, जहां हम अपने मूल और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह बचा सकते हैं और आपका राज्य (झारखंड) उनमें से एक प्रमुख राज्य है।” पीठ ने भावुक और गंभीर लहजे में आगे कहा कि देश के कुछ हिस्सों में आज भी ‘प्राकृतिक स्वर्ग’ (Natural Paradise) जैसे घने और समृद्ध वन मौजूद हैं, और कानूनी व प्रशासनिक स्तर पर उनका संरक्षण किया जाना बेहद जरूरी है।

क्या है पूरा कानूनी मामला

सर्वोच्च न्यायालय दरअसल झारखंड हाई कोर्ट के उस फैसले और आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जो राज्य में पर्यावरण और जंगलों की सुरक्षा के लिए जारी किया गया था। जनवरी का ऐतिहासिक निर्देश: इससे पहले इसी वर्ष जनवरी में झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक कड़ा निर्देश दिया था। इसके तहत राज्य के भीतर जितने भी अधिसूचित और ‘संरक्षित वन’ (Protected Forests) हैं, उनकी निर्धारित भौगोलिक सीमाओं के 1 किलोमीटर के दायरे (बफर जोन) के भीतर किसी भी प्रकार के पत्थर खनन (Stone Mining) या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले स्टोन क्रशर (Stone Crusher) प्लांट लगाने की अनुमति देने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था।

अप्रैल का अनुवर्ती आदेश : इसके बाद गत अप्रैल महीने में हाई कोर्ट ने वनों या वन भूमि की सीमाओं के नजदीक पर्यावरण अनापत्ति प्रमाणपत्र और काम शुरू करने की सहमति (Consent to Operate) से जुड़े कुछ और कड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसी आदेश की व्यवहारिकता को लेकर मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर पहुंचा है।

खनन और पर्यावरण संतुलन पर टिकी हैं नजरें

सुप्रीम कोर्ट द्वारा झारखंड हाई कोर्ट के इस कड़े रुख पर रोक न लगाते हुए वनों को ‘प्राकृतिक स्वर्ग’ बताना साफ संकेत देता है कि अदालत विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के पक्ष में है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद झारखंड सहित देश के अन्य जनजातीय व वनांचल राज्यों में जंगलों के करीब चल रही अवैध माइनिंग और स्टोन क्रशर लॉबी पर शिकंजा और ज्यादा कसना तय है।

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