विशेष आलेख

need to witness the confidence in tribal areas: आदिवासी इलाकों में घाव कुरेदने के बजाय विकास का विश्वास देखने की जरुरत

आलोक मेहता 

कांग्रेस और  प्रतिपक्ष के  नेता राहुल गांधी ने  पिछले दिनों मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के जगला गाँव (बिरसा ब्लॉक) के दौरे में आदिवासियों से बातचीत के दौरान  बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बीमारी, गंभीर कुपोषण, मलेरिया और दूषित पानी के कारण बच्चों की हुई मौतों पर गहरा दुख जताया और इसे सरकार की 100% विफलता बताया।  उन्होंने आरोप लगाया  कि ‘ ऐसा लगता है जैसे देश के बीचों-बीच रहने वाले आदिवासी परिवारों को पूरी तरह से अकेला छोड़ दिया गया है, और न तो केंद्र सरकार और न ही मध्य प्रदेश सरकार उनके साथ खड़ी है।’ क्या आदिवासी समाज की पूरी कहानी केवल किसी दुखद घटना, गरीबी, कुपोषण अथवा सरकारी विफलता की कहानी है?

क्या पिछले वर्षों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और दूसरे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में हुए बदलावों की भी चर्चा नहीं होनी चाहिए?और खासकर 2026 में जब भारत सरकार ही नहीं दुनिया  देश को नक्सल-मुक्त बनाने के अभियान की सफलता की तारीफ़ कर रही है | आदिवासी क्षेत्रों ने दशकों तक दोहरी मार झेली है।एक ओर गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और प्रशासन की पहुंच जैसी समस्याएं थीं।दूसरी ओर नक्सल हिंसा थी।नक्सलवाद ने सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं इलाकों को पहुंचाया जिनके नाम पर उसकी राजनीति की जाती थी।

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय राहुल गांधी आदिवासियों की अनदेखी पर राजनीति कर भोले भाले लोगों को भड़का रहे थे , उन्हीं दिनों मैं आदिवासी  बहुल  छत्तीसगढ़ की यात्रा कर रहा था | वह भी एक पत्रकार यशवंत धोटे द्वारा 15 वर्ष पहले शुरु किए गए दैनिक ‘ नव प्रदेश ‘ द्वारा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सेवा करने वाले युवाओं , महिलाओं , बुजुर्गों के सम्मान के लिए आयोजित समारोह को देखने के लिए | आयोजन राजधानी रायपुर  से दूर बेमेतरा में हुआ , जहाँ आदिवासी बच्चियों , महिलाओं पुरुषों ने गीत संगीत नृत्य से सबके साथ मुझे भी बहुत प्रसन्न और प्रभावित किया | समारोह के पहले और बाद में सामान्य लोगों , भाजपा और कांग्रेस से जुड़े कुछ नेताओं से बातचीत में अहसास हुआ कि छत्तीसगढ़ में सचमुच नया विश्वास आ रहा है | अब उन्हें माओवादियों की बंदूकों का डर नहीं , जल्दी से जल्दी अच्छी सड़कें , शिक्षा और स्वास्थ्य तथा अपने बनाए कुटीर उद्योग के सामान के दूर तक पहुंचाकर आमदनी बढ़ाने की चाह है | 

पत्रकार के नाते मैं 1976 से समय समय पर छत्तीसगढ़ जाता रहा हूँ | उन दिनों बस से बस्तर तक की कठिन यात्राएं भी की हैं | बस्तर के  गाँव के हाट बाजार में 20 मील दूर से केवल नमक खरीदने के लिए आने वाले आदिवासियों से स्थानीय व्यक्ति से उनकी भाषा समझकर बात की थी | तब आदिवासियों ने बताया था कि वे किसी तरह पेड़ पत्तों और लाल काले चींटों को खाने के लिए यह नमक लेने आते हैं | फिर कुछ वर्ष बाद नक्सल माओवादी हिंसा ने इस इलाके को प्रभावित किया | लेकिन पिछले कुछ  वर्षों में दो तीन यात्राओं के दौरान रायपुर बिलासपुर दुर्ग ही नहीं बस्तर जगदलपुर और दंतेवाड़ा में आदिवासियों की जिंदगी में भारी बदलाव और आर्थिक विकास आत्म निर्भरता का विश्वास देखने को मिला | 

 

कांग्रेस राज में  राजनीतिक उदारता मानव अधिकारों के नाम पर माओवादी नक्सली तत्वों और उनकी सहायता करने वाले शिक्षित लोगों को छूट दी गई | जिससे सड़क बनाने वाले मजदूरों को धमकाया गया। स्कूल भवनों को उड़ाया गया। पुलों को निशाना बनाया गया। मोबाइल टावरों और सरकारी संस्थानों को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस, सुरक्षा बलों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की हत्या हुई।इसलिए आज जब सुरक्षा के हालात बदल रहे हैं, तब  राहुल गांधी द्वारा केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि सरकार ने क्या नहीं किया।यह भी बताना  चाहिए कि अब क्या संभव हो रहा है? आख़िरकार पड़ोसी तेलंगाना , आंध्र और झारखण्ड में गैर भाजपा सरकारें हैं | वे भी नक्सल प्रभावित रहे और अब केंद्र की मोदी सरकार के सहयोग से आदिवासी इलाकों में विकास के कार्य कर रहे हैं |

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्षों में नक्सलवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उनकी सरकार ने सुरक्षा अभियान के साथ सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग, शिक्षा और सरकारी योजनाओं की पहुंच को भी रणनीति का हिस्सा बनाया। कभी हिंसा और पिछड़ेपन से प्रभावित क्षेत्रों में अब बड़े पैमाने पर प्रगति हो रही है। उन्होंने विशेष रूप से 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों, मोबाइल टावरों, बैंकिंग, डाक और संचार नेटवर्क का  विस्तार हो रहा है । उन्होंने बस्तर ओलंपिक्स को भी उस बदलाव का प्रतीक बताया जिसमें युवाओं की आकांक्षाएं हिंसा के पुराने भय की जगह ले रही हैं। 

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं। इसलिए उनके सामने अवसर भी बड़ा है और जिम्मेदारी भी। इस यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री साय , पूर्व मुख्यमंत्री और  विधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह से भी आदिवासी इलाकों की चुनौतियों और विकास कार्यों पर थोड़ी  अनौपचारिक चर्चा हुई | यह भी महत्वपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ और ओडिसा में पहली बार आदिवासी मुख्यमंत्री बने हैं |  गैर राजनीतिक लोगों से भी कुछ बातचीत हुई | हाँ तब सांसद और केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय ने डॉक्टर अमन सिंह के साथ आदिवासी इलाकों में जमीनी संघर्ष और हर संभव विकास के काम भी किए हैं |

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नक्सल विरोधी नीति ने सुरक्षा अभियान को निर्णायक रूप दिया और मई 2026 में अमित शाह ने बस्तर में नक्सल-मुक्ति की घोषणा कीनक्सलवाद समाप्त होने के बाद बस्तर को देश के सबसे पिछड़े और हिंसा प्रभावित क्षेत्र की पहचान से निकालकर विकास के नए मॉडल में बदलना एक ऐतिहासिक चुनौती है।सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वन उपज, पर्यटन, स्थानीय रोजगार और कौशल विकास—इन सभी क्षेत्रों में समानांतर काम हो रहा है ।बस्तर की अर्थव्यवस्था में आदिवासी समुदाय की भागीदारी बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।

सरकार द्वारा वन उपज, कृषि, डेयरी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी जब उनका वास्तविक आर्थिक लाभ गांव के परिवारों तक पहुंचे। केंद्र की ओर से भी बस्तर में सहकारी डेयरी, ‘सेवा डेरा’, ‘बस्तर ओलंपिक्स’ और ‘बस्तर पंडुम’ जैसे कार्यक्रमों को विकास एवं सामाजिक भागीदारी से जोड़ा गया है।  आदिवासी युवाओं के सामने पहली बार अलग भविष्य दिख रहा है |

नक्सलवाद की सबसे बड़ी मानवीय कीमत युवा पीढ़ी ने चुकाई। युवाओं को  आई टी आई ,  कौशल प्रशिक्षण, खेल, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण, वन उत्पाद आधारित उद्योग, छोटे कारोबार और सरकारी योजनाओं से जोड़ना होगा। आदिवासी समाज को केवल पीड़ित समुदाय के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है ।आदिवासी समाज आज परिवर्तन चाहता है।वह अपने बच्चों के लिए सरकारी नौकरी ही नहीं, निजी क्षेत्र और उद्यमिता के अवसर भी चाहता है।और सबसे महत्वपूर्ण—वह भयमुक्त जीवन चाहता है।नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का अंतिम लक्ष्य केवल बंदूकें शांत करना नहीं, बल्कि आदिवासी परिवारों के जीवन में स्थायी शांति, सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि लाना होना चाहिए।यही वह कसौटी है जिस पर आने वाले वर्षों में मोदी सरकार, राज्य सरकारों और विपक्ष—सभी को परखा जाएगा।

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