प्रसंगवश : जेन जी या जेन अल्फा का स्थाई समाधान हो

यशवंत धोटे
हर तीसरे दिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होता है कि जेन जी या जेन अल्फा यानि (solution for Gen Z or Gen Alpha) स्कूल कालेज के छात्र अपने शैक्षणिक भविष्य को लेकर कितने संजीदा है। कभी जेन जी तो कभी जेन अल्फा यानि स्कूली बच्चे अपने स्कूल और शिक्षा को लेकर सड़क पर आ रहे हैं। अपने गांव से दसियों किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्टर से गुहार लगा रहे हैं। पिछले 20 जुलाई को जंतर मंतर पर जेन जी के आन्दोलन के बाद कुछ इस तरह के वीडियों ज्यादा ही आ रहे हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सचमुच सरकारी तंत्र स्कूल शिक्षा के प्रति उदासीन हैं।
हाल ही में अम्बिकापुर जिले के एक गांव सें एक स्कूल की छात्राओं का जत्था कलेक्टर से मिलने 10 किलोमीटर जिला मुख्यालय पैदल ही पहुंच गया। हालांकि यह सिलसिला बदस्तूर जारी हैं लेकिन भारी भरकम बजट और लाव लश्कर वाले शिक्षा विभाग के अफसर एक विशेष अभियान चलाकर इसके ठीक क्यों नहीं कर देते? स्कूलों की दयनीय स्थिति कोई एक दिन में तो नहीं हुई होगी या शिक्षा का बुरा हाल एक दिन की बात तो नहीं है।
सरकारों की प्राथमिकता शिक्षा और स्वास्थ को छोड़ वे सभी आयाम है जिससे चुनाव प्रभावित होते है। बहरहाल जिले में बैठे कलेक्टरों और शिक्षा विभाग (solution for Gen Z or Gen Alpha) के अफसरों ने शैक्षणिक संस्थानों की साप्ताहिक या मासिक समीक्षा करना छोड़ दिया है यदि की होती तो सोशल मीडिया पर उसकी रील भी आ जाती क्योंकि आजकल प्रत्येक मंत्री के साथ एक सोशल मीडिया की टीम चलती है और मंत्री जी की भेट मुलाकात के बाद फेसबुक और इंस्टा पर अपलोड हो जाती है।
अफसोंस यह कि जेन जी या जेन अल्फा के वीडियो का काउन्टर सरकारी तंत्र नहीं कर पा रहा है। जंतर मंतर के आन्दोलन के बाद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा उसके बाद भी शिक्षा को लेकर देशव्यापी वीडियों वायरल हो रहे है लेकिन सरकार ने अब तक इसका कोई स्थाई समाधान नहीं निकाल पा रही है। बहरहाल जेन जी और जेन अल्फा अपनी शैक्षणिक जरूरतों को लेकर जब इतना गंभीर है तो सरकार को भी इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए और हफ्ते, महिने में ग्रामीण इलाको में लगने वाले जन समस्या निवारण शिविरों में शिक्षा विभाग का भी एक स्टाल लगा दिया जाना चाहिए ताकि किसी जेन जी या जेन अल्फा को पैदल शहर की ओर न दौड़ लगाना पड़े।



