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Supreme Court : मानवाधिकार आयोगों में खाली पदों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ, पहले हाई कोर्ट जाने की दी सलाह

देश के कई राज्य मानवाधिकार आयोगों में लंबे समय से खाली पड़े पदों का मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंचा, लेकिन याचिकाकर्ता को तत्काल राहत नहीं मिल सकी। शीर्ष अदालत ने सुनवाई से इनकार करते हुए पूछा कि संबंधित राज्यों के हाई कोर्ट का दरवाजा पहले क्यों नहीं खटखटाया गया।

शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया। हालांकि अदालत ने अन्य उपलब्ध कानूनी विकल्प अपनाने की छूट भी प्रदान की।

क्या थी याचिका में मांग : Supreme Court

याचिका में मांग की गई थी कि विभिन्न राज्य मानवाधिकार आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के रिक्त पदों को जल्द भरने के लिए संबंधित सरकारों को निर्देश जारी किए जाएं। याचिकाकर्ता का कहना था कि कई राज्यों में लंबे समय से महत्वपूर्ण पद खाली हैं, जिससे आयोगों के कामकाज पर असर पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा अहम सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि संबंधित मामलों को लेकर पहले हाई कोर्ट का रुख क्यों नहीं किया गया। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में पहले उपलब्ध कानूनी उपायों का उपयोग किया जाना चाहिए। पीठ के इस रुख के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।

उत्तर प्रदेश का भी हुआ जिक्र

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में पिछले दो वर्षों से अध्यक्ष का पद खाली (Supreme Court) है। इस पर अदालत ने मामले की पृष्ठभूमि को समझने के लिए कुछ सवाल किए। वकील ने यह भी कहा कि पहले शीर्ष अदालत ने मानवाधिकार संस्थाओं में रिक्तियों को लेकर नोटिस जारी किया था।

पुरानी और नई याचिका में अंतर बताया

अदालत ने पूछा कि जब पहले भी इसी तरह का मामला उठाया गया था तो नई याचिका की आवश्यकता क्यों पड़ी। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से स्पष्ट किया गया कि पूर्व याचिका राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में रिक्तियों से जुड़ी थी, जबकि वर्तमान मामला राज्य मानवाधिकार आयोगों के खाली पदों से संबंधित है।

कानूनी विकल्प खुले

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते (Supreme Court) हुए कहा कि याचिकाकर्ता कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का इस्तेमाल कर सकता है। अब संभावना है कि संबंधित मामलों को लेकर अलग-अलग राज्यों के हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की जा सकती हैं।

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