Prisoner Release : एक ही मामले में एक को राहत, दूसरे को इनकार क्यों? हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
जेलों में बंद कैदियों की समय पूर्व रिहाई को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी (Prisoner Release) की है। अदालत ने कहा कि समान परिस्थितियों वाले मामलों में अलग अलग दृष्टिकोण अपनाना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है। इसी मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने प्रशासनिक प्रक्रिया में समानता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
मामला एक ऐसे कैदी से जुड़ा है, जिसने अपने सह आरोपी को मिली राहत का हवाला देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान यह प्रश्न प्रमुखता से उठा कि जब अपराध, घटना और भूमिका समान हो तो रिहाई के मामले में अलग अलग राय क्यों दी गई।
हाईकोर्ट ने सरकार को दिए निर्देश Prisoner Release
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता की समय पूर्व रिहाई के आवेदन पर निर्णय लेते समय समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखा जाए। अदालत ने मामले को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि सक्षम प्राधिकारी को दोबारा विचार कर कानून के अनुसार निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।
आजीवन कारावास की सजा काट रहा है कैदी
याचिकाकर्ता रामफल कश्यप जांजगीर चांपा जिले के निवासी हैं। उन्हें वर्ष 2012 में हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। जब उन्हें जेल भेजा गया था तब उनकी उम्र लगभग 34 वर्ष थी और वे पिछले कई वर्षों से बिलासपुर केंद्रीय जेल में सजा काट रहे हैं।
समय पूर्व रिहाई के लिए दिया था आवेदन
कैदी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के तहत समय पूर्व रिहाई के लिए आवेदन किया था। नियमानुसार इस आवेदन पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश से राय मांगी गई। रिकॉर्ड के अनुसार मई 2026 में संबंधित न्यायिक अधिकारी ने रिहाई के पक्ष में सहमति नहीं दी और नकारात्मक राय भेज दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती पेश की।
सह आरोपी को मिली थी सकारात्मक राय
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि इसी हत्याकांड में शामिल सह आरोपी राकेश केवट के संबंध में रिहाई के लिए सकारात्मक राय (Prisoner Release) दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि दोनों की भूमिका और अपराध की प्रकृति समान होने के बावजूद एक को राहत और दूसरे को असहमति मिलना भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
अदालत ने समानता के सिद्धांत पर दिया जोर
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद माना कि दोनों आरोपियों का मामला एक ही घटना से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अंतिम निर्णय लेते समय संबंधित तथ्यों का समुचित परीक्षण आवश्यक है। अदालत ने कहा कि समान परिस्थितियों वाले मामलों में समानता के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए और किसी भी प्रकार की विसंगति की समीक्षा की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का भी उल्लेख
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय पूर्व रिहाई से जुड़े मामलों में निर्धारित दिशा निर्देशों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पूर्व निर्धारित कानूनी मानकों और न्यायिक सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है, ताकि निर्णय प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।
जल्द निर्णय लेने के निर्देश
खंडपीठ ने गृह विभाग और संबंधित सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि सह आरोपी को मिली सिफारिश और उपलब्ध रिकॉर्ड का अध्ययन करते (Prisoner Release) हुए याचिकाकर्ता के आवेदन पर शीघ्र और कानून सम्मत निर्णय लिया जाए। इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निराकरण करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष छोड़ दिया है।



