छत्तीसगढ़

High Court Verdict : सिर्फ देरी के आधार पर नहीं छीन सकते न्याय, हाईकोर्ट ने आदिवासी ग्रामीणों को दी बड़ी राहत

दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की कानूनी परेशानियों को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण (High Court Verdict) टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि ऐसे लोग अक्सर अपनी कानूनी प्रक्रिया के लिए पूरी तरह वकीलों पर निर्भर रहते हैं और हर समय मुकदमों की जानकारी हासिल कर पाना उनके लिए संभव नहीं होता। इसलिए केवल देरी के आधार पर उन्हें न्याय से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।

यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें ग्रामीणों के घरों पर बेदखली का खतरा मंडरा रहा था। अदालत ने तकनीकी आधार पर याचिका खारिज किए जाने के फैसले को गलत ठहराते हुए मामले को फिर से सुनवाई के लिए भेज दिया है।

राजस्व मंडल का आदेश रद्द High Court Verdict

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने बिलासपुर राजस्व मंडल के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें देरी से दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने निर्देश दिया है कि मामले की सुनवाई अब तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि उपलब्ध तथ्यों और मेरिट के आधार पर की जाए।

बेदखली की कार्रवाई से जुड़ा है मामला

मामला बलरामपुर रामानुजगंज जिले के मरियमपारा गांव के कोदिया उरांव और अन्य ग्रामीणों से जुड़ा है। इनके खिलाफ तहसीलदार द्वारा बेदखली की कार्रवाई शुरू की गई थी। ग्रामीणों का कहना था कि वे लंबे समय से वहां मकान बनाकर रह रहे हैं और उन्हें संबंधित आदेश की जानकारी काफी देर से मिली।

सात महीने बाद दाखिल हुई थी याचिका

कमिश्नर सरगुजा संभाग ने जुलाई 2025 में ग्रामीणों के खिलाफ फैसला दिया था। ग्रामीणों का दावा था कि वे दूरस्थ क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और कम साक्षर लोग हैं, इसलिए उन्हें आदेश की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी।

जब प्रशासन कथित रूप से मकान हटाने की कार्रवाई के लिए पहुंचा तब जनवरी 2026 में उन्हें फैसले की जानकारी (High Court Verdict) हुई। इसके बाद उन्होंने राजस्व मंडल में पुनरीक्षण याचिका दायर की और देरी माफी का आवेदन भी लगाया।

राजस्व मंडल ने माना था लापरवाही

राजस्व मंडल ने मार्च 2026 में यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था कि याचिकाकर्ताओं ने अपने वकील से नियमित रूप से मामले की जानकारी नहीं ली, जो उनकी लापरवाही को दर्शाता है। इसी आदेश को चुनौती देते हुए ग्रामीणों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

अदालत ने माना उचित कारण

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सभी ग्रामीण आदिवासी समाज से आते हैं और दूरस्थ क्षेत्र में निवास करते हैं। वे पूरी तरह अपने अधिवक्ता पर निर्भर थे और आदेश की जानकारी मिलते ही उन्होंने कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों को देरी के उचित कारण के रूप में देखा जाना चाहिए।

न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि विलंब माफी संबंधी कानून का उद्देश्य लोगों को तकनीकी आधार पर अधिकारों से वंचित करना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित (High Court Verdict) करना है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना उन्हें लापरवाह मानना उचित नहीं है। इसी आधार पर मामला दोबारा विचार के लिए राजस्व मंडल को भेज दिया गया है।

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