BSP Iron Theft : भिलाई इस्पात संयंत्र से करोड़ों का लोहा कैसे निकलता रहा, पुलिस जांच में सामने आया चौंकाने वाला पूरा खेल
देश के सबसे सुरक्षित औद्योगिक परिसरों में गिने जाने वाले भिलाई इस्पात संयंत्र में सामने (BSP Iron Theft) आए कथित लोहा चोरी मामले ने हर किसी को हैरान कर दिया है। पुलिस की कार्रवाई के बाद अब एक ऐसा नेटवर्क सामने आया है, जिसने सुरक्षा व्यवस्था, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और प्लांट के अंदर की कार्यप्रणाली पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में सामने आई जानकारियों के बाद यह मामला केवल चोरी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि संगठित तरीके से चल रहे पूरे नेटवर्क की कहानी बन गया है।
पुलिस के मुताबिक यह काम किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं थी। कथित मास्टरमाइंड, ट्रांसपोर्टर, कुछ अधिकारी, कर्मचारी, ड्राइवर, क्रेन ऑपरेटर और स्क्रैप कारोबारियों की भूमिका की जांच की जा रही है। अब तक 15 लोगों की गिरफ्तारी (BSP Iron Theft) हो चुकी है और जांच लगातार आगे बढ़ रही है।
देश के बड़े प्रोजेक्टों के लिए यहीं तैयार होता है स्टील BSP Iron Theft
भिलाई इस्पात संयंत्र देश के प्रमुख स्टील प्लांटों में शामिल है। यहां तैयार स्टील का उपयोग रेलवे ट्रैक, मेट्रो परियोजनाओं, बड़े पुलों, राष्ट्रीय राजमार्गों और रक्षा क्षेत्र के कई अहम कार्यों में किया जाता है। ऐसे में यहां से कथित तौर पर संगठित तरीके से लोहा बाहर निकलने का मामला राष्ट्रीय औद्योगिक सुरक्षा से भी जुड़ा माना जा रहा है।

फ्ल्यू डस्ट की आड़ में बाहर भेजा जाता था लोहा
पुलिस जांच के अनुसार स्टील निर्माण के दौरान निकलने वाली फ्ल्यू डस्ट को प्लांट से बाहर भेजने की नियमित प्रक्रिया का ही फायदा उठाया गया। आरोप है कि ट्रकों में पहले कीमती लोहे की प्लेटें और कटिंग रखी जाती थीं, फिर उनके ऊपर फ्ल्यू डस्ट की मोटी परत डाल दी जाती थी। बाहर से देखने पर ट्रक सामान्य दिखाई देता था, जबकि नीचे लाखों रुपए का लोहा छिपा होता था।
पहले से तय रहते थे ट्रक और ड्राइवर
जांच में सामने आया है कि हर ट्रक का इस्तेमाल इस काम के लिए नहीं किया जाता था। कुछ चुनिंदा ट्रक और ड्राइवर पहले से तय रहते थे। एक ट्रक में लगभग 30 से 40 टन तक लोहा छिपाकर ले जाने की बात पुलिस ने कही है। पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर अलग अलग लोगों की भूमिका होने की आशंका जताई गई है।
वे ब्रिज से शुरू होती थी पूरी निगरानी BSP Iron Theft
ट्रक सबसे पहले बिल्टी लेकर वे ब्रिज पहुंचता था, जहां उसका वजन दर्ज होता और उस पर जीपीएस (BSP Iron Theft) लगाया जाता था। इसके बाद वह फ्ल्यू डस्ट लोड करने के लिए निर्धारित स्थान पर जाता और दोबारा वे ब्रिज लौटता था। यहीं से कथित तौर पर पूरे खेल की शुरुआत होती थी।
नंबर प्लेट और जीपीएस बदलने का आरोप
पुलिस के मुताबिक फ्ल्यू डस्ट लोड होने के बाद ट्रक से जीपीएस निकाल दिया जाता था और नंबर प्लेट भी बदल दी जाती थी। इसके बाद ट्रक को एक दूसरी जगह ले जाकर फ्ल्यू डस्ट का कुछ हिस्सा हटाया जाता और एसएमएस तीन यूनिट में क्रेन से लोहा लोड किया जाता था। आखिर में फिर फ्ल्यू डस्ट डालकर सब कुछ सामान्य दिखा दिया जाता था।
दो ड्राइवर और निजी ऑपरेटर संभालते थे जिम्मेदारी
जांच में यह भी सामने आया है कि एक ड्राइवर ट्रक को तय स्थान तक लाता था और दूसरा उसे आगे लेकर जाता था। वहीं कुछ निजी ऑपरेटर पूरे नेटवर्क की निगरानी, ट्रकों की आवाजाही और लोडिंग का काम संभालते थे ताकि किसी को संदेह न हो।
सुरक्षा जांच पर उठे गंभीर सवाल
प्लांट से बाहर निकलने से पहले ट्रकों की जांच होती थी और वहां सुरक्षा बल तैनात (BSP Iron Theft) रहता था। जानकारी के अनुसार फ्ल्यू डस्ट वाले ट्रकों की जांच लोहे की लंबी रॉड डालकर की जाती थी। इसके बावजूद यदि महीनों तक कथित तौर पर लोहा बाहर निकलता रहा तो जांच प्रक्रिया और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। पुलिस यह भी देख रही है कि कई संवेदनशील स्थानों पर कैमरे क्यों नहीं लगे थे।
समय और ट्रकों की पूरी योजना पहले से तैयार रहती थी BSP Iron Theft
पुलिस सूत्रों का कहना है कि ट्रकों के अंदर आने और बाहर निकलने का समय पहले से तय रहता था। नो एंट्री अवधि खत्म होने के बाद ही ट्रकों को बाहर निकाला जाता था। इतना ही नहीं, एक दिन में कितने ट्रकों से लोहा भेजा जाएगा, इसकी भी पहले से योजना बनाई जाती थी।
एक जैसे ट्रकों से दिया जाता था चकमा
जांच में पता चला है कि एक ही रंग के दो ट्रकों का इस्तेमाल (BSP Iron Theft) किया जाता था। आरोप है कि दोनों के नंबर प्लेट और जीपीएस बदल दिए जाते थे जिससे सीसीटीवी फुटेज में पहचान करना मुश्किल हो जाता था और सुरक्षा व्यवस्था भ्रमित हो जाती थी।
पुराने नंबर और गुप्त चेंबर का भी इस्तेमाल
पुलिस के अनुसार कुछ ट्रकों में पुराने बंद वाहनों के नंबर लगाए जाते थे। वहीं कुछ ट्रकों में विशेष गुप्त चेंबर (BSP Iron Theft) बनाए गए थे जिनमें स्क्रैप और लोहा छिपाकर बाहर ले जाया जाता था। अब यह जांच की जा रही है कि इतने समय तक यह तरीका पकड़ में क्यों नहीं आया।
वजन बराबर रखने के लिए अपनाया जाता था अलग तरीका BSP Iron Theft
जांच में सामने आया है कि कुछ ट्रकों के दो पहिए प्लांट के भीतर ही निकाल दिए जाते थे और उनके वजन के बराबर स्क्रैप भर दिया जाता था। इससे कुल वजन लगभग समान रहता था और वजन जांच के दौरान कोई बड़ा अंतर दिखाई नहीं देता था।
गोदाम में होती थी छंटाई
पुलिस के मुताबिक प्लांट से बाहर निकलने के बाद चोरी का लोहा सीधे खरीदार तक नहीं पहुंचता था। पहले उसे अकलोरडीह स्थित गोदाम ले जाया जाता था, जहां फ्ल्यू डस्ट अलग कर लोहे की छंटाई की जाती थी। जरूरत पड़ने पर उसे दूसरी गाड़ियों में भी भेजा जाता था।
फर्जी बिल के जरिए बनाया जाता था वैध माल
आरोप है कि इसके बाद एक कारोबारी फर्म के माध्यम से फर्जी बिल तैयार किए जाते थे ताकि चोरी का लोहा वैध माल की तरह दिखाया जा सके। फिर यही माल रायपुर समेत अन्य शहरों की रोलिंग मिलों तक पहुंचाया जाता था।
ऐसे कमाई करता था पूरा नेटवर्क
पुलिस जांच के अनुसार चोरी का लोहा पहले करीब 32 रुपए प्रति किलो में दलालों को बेचा जाता था। बाद में वही लोहा 36 रुपए प्रति किलो तक आगे सप्लाई किया जाता था, जबकि बाजार में उसकी कीमत 50 से 55 रुपए प्रति किलो बताई गई है। इसी मूल्य अंतर से पूरे नेटवर्क को बड़ा मुनाफा होने की आशंका जताई गई है।
छह महीने में 114 करोड़ रुपए तक के नुकसान का अनुमान
जांच में सामने आए आंकड़ों के आधार पर पुलिस का अनुमान है कि सप्ताह में चार दिन और प्रतिदिन लगभग 200 टन लोहा बाहर निकाला जाता था। जनवरी से जून 2026 के बीच करीब 20,800 टन लोहा बाहर भेजे जाने का अनुमान लगाया गया है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 104 से 114 करोड़ रुपए तक बैठती है।
ठेका मजदूर के पहचान पत्र से होती थी एंट्री
पुलिस के अनुसार कथित मास्टरमाइंड संजय सिंह ठेका मजदूर के पहचान पत्र का उपयोग कर प्लांट में प्रवेश (BSP Iron Theft) करता था। जांच में यह भी सामने (BSP Iron Theft) आया है कि प्लांट के भीतर उसका एक कार्यालय भी संचालित होता था, जहां से ट्रकों की आवाजाही और पूरे नेटवर्क पर नजर रखी जाती थी। अब यह पता लगाया जा रहा है कि उसे यह सुविधा किसकी मदद से मिली।
अन्य सिंडिकेट और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल
वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने दावा किया है कि प्लांट में केवल लोहा ही नहीं बल्कि कॉपर, पीतल और इलेक्ट्रिकल उपकरणों की चोरी करने वाले कई अलग अलग सिंडिकेट (BSP Iron Theft) सक्रिय हैं। उन्होंने ट्रांसपोर्ट व्यवस्था और सुरक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं तथा मामले की केंद्रीय जांच की मांग की है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच जारी है।
सीआईएसएफ की भूमिका की भी हो रही पड़ताल
भिलाई इस्पात संयंत्र की सुरक्षा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जिम्मे है। ऐसे में जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि यदि पुलिस के दावों के मुताबिक लंबे समय तक यह गतिविधियां चलती रहीं तो सुरक्षा व्यवस्था (BSP Iron Theft) में कहां चूक हुई। फिलहाल इस संबंध में किसी भी स्तर पर अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है और जांच जारी है।



