संपादकीय : ब्रिक्स में दिखी भारत की ताकत
Editorial: नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में एक बार फिर सारी दुनिया ने भारत की ताकत देखी। ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने जहां अपने पुराने मित्र रूस के साथ अपने आर्थिक संबंध और अधिक मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाया वहीं भारत और चीन के बीच भी क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर द्विपक्षीय सहयोग बढ़़ाने पर सहमति कायम हुई।
सबसे बड़ी बात यह कि इस सम्मेलन के दौरान रूस के साथ ही पहली बार चीन ने भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए भारत का खुलकर समर्थन किया। जो भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए भारत का दुनिया के तमाम देशों ने पहले ही समर्थन किया है। किन्तु चीन भारत की सदस्यता का विरोध करता रहा है।
अपने वीटो पावर का उपयोग कर चीन भारत की राह में रोड़े अटकाता रहा है। जबकि चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता भारत की ही कृपा से मिली है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सुरक्षा परिषद में अपनी जगह चीन को सदस्य बनाने की सिफारिश की थी। भारत के इस एहसान को चीन भूल गया और लगातार सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए भारत के दावे की मुखालफत करता रहा है किन्तु अब भारत के प्रति उसका नजरिया बदला है और ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान उसने भारत क ी सदस्यता की वकालत की है।
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत की पहल पर ब्रिक्स देशों ने अपने संयुक्त घोषणा पत्र में आतंकवाद के मुद्दे को भी शामिल किया और पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई। यही नहीं बल्कि आतंकवाद पर करारा प्रहार करते हुए कहा गया कि आतंकवादियों को फंडिग करने वाले और उन्हें पनाह देने वालों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की जानी चाहिए। यह सीधे सीधे पाकिस्तान पर प्रहार था जो आज की तारीख में आतंकवादियों का सबसे सुरक्षित पनाहगाह बना हुआ है। इस दौरान यह भी कहा गया कि आतंकवाद पर दोहरा रवैया अब नहीं चलेगा।
आतंकवाद का मुद्दा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रमुखता से उठना भारत की उल्लेखनीय कूटनीतिक सफलता है। भारत और रूस की मित्रता सर्वविदित है लेकिन पहली बार भारत और चीन के बीच रिश्तों में जमीं बर्फ भी पिघलती नजर आई। भारत मंडपम में भारतीय पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपींग के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई जिसमें दोनों देशो के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। यही नहीं बल्कि दोनों नेताओं के बीच इस बात पर भी सहमति कायम हुई की भारत चीन संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालीक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और इसमें मौजूदा मतभेदों को किसी भी रूप में विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सीमा पर शांति बनाये रखने पर जोर देते हुए कहा कि आपसी बातचीत से सीमा संबंधी चिंताओं और मतभेदों का निवारण किया जा सकता है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को लेकर भी चर्चा हुई और वहां शांति कायम करने के लिए समवेश प्रयास करने की जरूरत पर बल दिया गया।



