दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की बड़ी उपलब्धि, 110 रूट किलोमीटर में शुरू हुई ऑटोमैटिक सिग्नलिंग
रायपुर. दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने रेल परिचालन के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2026 में अप्रैल से नवंबर के बीच जोन के 13 रेलखंडों में कुल 110 रूट किलोमीटर रेलमार्ग पर स्वचालित सिग्नलिंग प्रणाली शुरू की गई है। यह कार्य 235 किलोमीटर दोहरी रेल लाइन के समतुल्य है। नवंबर के पहले सप्ताह में बिलासपुर मंडल के सक्ती-झाराडीह-खरसिया तथा हर्री-वेंकटनगर-निगौरा रेलखंडों में भी इस आधुनिक प्रणाली की शुरुआत की गई।
रेलवे के अनुसार, स्वचालित सिग्नलिंग शुरू होने से एक ही रेलमार्ग पर पहले की तुलना में अधिक ट्रेनों का परिचालन संभव होगा। इससे ट्रेनों के अनावश्यक ठहराव में कमी आएगी तथा समयपालन में सुधार होगा। इसका लाभ यात्री ट्रेनों के साथ-साथ कोयला, इस्पात, सीमेंट एवं बिजली उद्योगों से जुड़ी मालगाड़ियों को भी मिलेगा।
क्या है स्वचालित सिग्नलिंग प्रणाली?
पारंपरिक सिग्नलिंग व्यवस्था में दो स्टेशनों के बीच एक समय में सामान्यतः एक ही ट्रेन का परिचालन किया जाता है। पहली ट्रेन के अगले स्टेशन तक पहुंचने के बाद ही दूसरी ट्रेन को आगे बढ़ने की अनुमति मिलती है।
वहीं स्वचालित सिग्नलिंग प्रणाली में दो स्टेशनों के बीच रेलमार्ग को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक हिस्से में सिग्नल लगाए जाते हैं, जो ट्रेनों की स्थिति के अनुसार स्वतः बदलते हैं। इससे एक ही रेलखंड में सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए एक के बाद एक कई ट्रेनों का परिचालन किया जा सकता है।
यह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली पटरी पर ट्रेनों की स्थिति की लगातार निगरानी करती है। आगे का मार्ग सुरक्षित एवं खाली होने पर ही ट्रेन को आगे बढ़ने का संकेत मिलता है। इससे मानवीय निर्भरता कम होती है और परिचालन की विश्वसनीयता बढ़ती है।
सक्ती-झाराडीह-खरसिया खंड में 32 नए सिग्नल स्थापित
बिलासपुर मंडल के हावड़ा-मुंबई मुख्य रेलमार्ग पर स्थित सक्ती-झाराडीह-खरसिया खंड में 2 नवंबर 2026 को शाम 6:30 बजे स्वचालित सिग्नलिंग प्रणाली प्रारंभ की गई। चार रेल लाइनों वाले इस खंड की लंबाई 16 रूट किलोमीटर है, जो 32 किलोमीटर दोहरी लाइन के बराबर है।
इस परियोजना के अंतर्गत 32 नए स्वचालित सिग्नल स्थापित किए गए हैं। पूरी व्यवस्था को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली से जोड़ा गया है। ट्रेनों की स्थिति की सटीक जानकारी के लिए मल्टी-सेक्शन डिजिटल एक्सल काउंटर (एमएसडीएसी) के 180 डिटेक्शन पॉइंट लगाए गए हैं।
इसके अलावा प्रणाली की निगरानी के लिए 1024 बिट क्षमता वाला नया डेटालॉगर, उपकरणों की सुरक्षा के लिए फायर अलार्म, केबलों की निगरानी के लिए अर्थ लीकेज डिटेक्टर और निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए स्वचालित फ्यूज चेंजओवर प्रणाली स्थापित की गई है।
हर्री-वेंकटनगर-निगौरा में भी शुरू हुई आधुनिक प्रणाली
बिलासपुर मंडल के बिलासपुर-अनूपपुर रेलखंड के हर्री-वेंकटनगर-निगौरा सेक्शन में 5 नवंबर 2026 को स्वचालित सिग्नलिंग प्रणाली शुरू की गई। तीन रेल लाइनों वाले इस खंड की लंबाई 18 रूट किलोमीटर है, जो 36 किलोमीटर दोहरी लाइन के समतुल्य है।
यह कार्य रेलवे अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) के मानक डिजाइन के अनुरूप पूरा किया गया है। इस परियोजना में स्वचालित सिग्नलिंग को इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली से सीधे जोड़ा गया है। इसे दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की परियोजना इकाई, बिलासपुर ने पूरा किया है।
इस खंड में कुल 40 स्वचालित सिग्नल स्थापित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त तीनों स्टेशनों के यार्ड में 24 सेमी-ऑटोमैटिक सिग्नल लगाए गए हैं। इनमें हर्री यार्ड में 12, वेंकटनगर यार्ड में 10 और निगौरा यार्ड में 2 सिग्नल शामिल हैं।
ट्रेनों की स्थिति की सटीक जानकारी के लिए एमएसडीएसी के 172 डिटेक्शन पॉइंट और 197 ट्रैक सेक्शन बनाए गए हैं। इसके साथ ही एक ऑटो हट, 24 ए-मार्कर बोर्ड, डेटालॉगर, एकीकृत विद्युत आपूर्ति प्रणाली, अर्थ लीकेज डिटेक्टर और फायर अलार्म जैसी सुविधाएं भी स्थापित की गई हैं।
रेल परिचालन क्षमता बढ़ने के साथ यात्रियों को मिलेंगे कई फायदे
स्वचालित सिग्नलिंग प्रणाली शुरू होने से दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के रेल नेटवर्क को कई फायदे मिलेंगे।
- अधिक ट्रेनों का परिचालन: एक ही रेलमार्ग पर सुरक्षित तरीके से अधिक ट्रेनों को चलाने की क्षमता बढ़ेगी।
- समयपालन में सुधार: ट्रेनों को स्टेशनों के बाहर और बीच मार्ग में अनावश्यक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
- यात्रा समय में बचत: ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम होने से यात्रियों का समय बचेगा।
- नई ट्रेनों की संभावना: रेलमार्ग की क्षमता बढ़ने से भविष्य में नई ट्रेनें और अतिरिक्त फेरे शुरू करने की संभावनाएं बढ़ेंगी।
- माल परिवहन को गति: कोयला, इस्पात, सीमेंट और बिजली उद्योगों से जुड़ी मालगाड़ियों का परिचालन अधिक सुगम होगा।
- सुरक्षित एवं विश्वसनीय परिचालन: आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और सतत निगरानी से परिचालन की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- ऊर्जा की बचत: ट्रेनों के बार-बार रुकने और चलने में कमी आने से ऊर्जा की बचत होगी।
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