Supreme Court : गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला, सिर्फ इस कमी से नहीं मिलेगी राहत
कानूनी प्रक्रिया और गिरफ्तारी के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए बड़ा फैसला (Supreme Court) सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि यदि किसी आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए हैं, तो केवल उनके पर्याप्त न होने का दावा करके गिरफ्तारी को अवैध नहीं माना जा सकता। अदालत ऐसे मामलों में यह भी देखेगी कि आरोपी को वास्तव में कोई नुकसान हुआ है या नहीं।
यह फैसला मेघालय के चर्चित हनीमून हत्याकांड की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी की जमानत से जुड़े मामले में आया है। फैसले के बाद गिरफ्तारी की वैधता और जमानत से जुड़े कानूनी पहलुओं पर नई स्पष्टता सामने आई है।

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया हाईकोर्ट का आदेश Supreme Court
जस्टिस एम एम सुन्दरेश और जस्टिस पी बी वराले की खंडपीठ ने मेघालय हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके आधार पर सोनम रघुवंशी को जमानत मिली थी।
हाईकोर्ट ने माना था कि गिरफ्तारी के दस्तावेजों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के स्थान पर अस्तित्वहीन धारा 403(1) का उल्लेख किया गया था, जिससे गिरफ्तारी के आधार सही ढंग से नहीं बताए गए।
गिरफ्तारी के आधार नहीं बताना और पर्याप्त जानकारी न देना अलग
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोपी को गिरफ्तारी के आधार पूरी तरह नहीं छिपाए गए थे। विवाद केवल इस बात का था कि जो आधार बताए गए, वे पर्याप्त थे या नहीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधार बिल्कुल नहीं बताना और पर्याप्त जानकारी न देना, दोनों अलग स्थितियां हैं। यदि आधार बताए ही नहीं गए हों तो गिरफ्तारी अवैध मानी जा सकती है, लेकिन यदि आधार बताए गए हैं तो यह देखा जाएगा कि उससे आरोपी को वास्तविक नुकसान हुआ या नहीं।
पहले संतोष जताया, बाद में उठाया सवाल Supreme Court
खंडपीठ ने कहा कि सोनम रघुवंशी ने शुरुआत में गिरफ्तारी के कारणों पर संतोष व्यक्त किया था। बाद में उसी मुद्दे को आधार बनाकर राहत मांगना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी ने अपनी पहली तीन जमानत याचिकाओं में इस मुद्दे को नहीं उठाया था। चौथी जमानत अर्जी में पहली बार इसे आधार बनाया गया।
दोबारा गिरफ्तारी का अधिकार बना रहता है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी देने में कोई कमी रह भी जाए, तब भी इससे जांच एजेंसी की दोबारा गिरफ्तारी करने की वैधानिक शक्ति समाप्त (Supreme Court) नहीं होती। खंडपीठ के अनुसार, कानून जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी करने से नहीं रोकता और ऐसी तकनीकी कमी भविष्य की जांच प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करती।
तीन सप्ताह में आत्मसमर्पण का निर्देश
अदालत ने कहा कि जमानत सामान्य नियम और जेल अपवाद (Supreme Court) जरूर है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियां अलग हैं। पहले की जमानत याचिकाएं गुण दोष के आधार पर खारिज हो चुकी हैं और मुकदमे की सुनवाई भी शुरू हो गई है। ऐसे में जमानत जारी रहने से निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
इन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने सोनम रघुवंशी को दी गई जमानत रद्द करते हुए तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश (Supreme Court) दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि छह महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं होती है, तो आरोपी नई जमानत याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होगी और इस आदेश को उसके खिलाफ बाधा नहीं माना जाएगा।



