संपादकीय: भाजपा को करारा झटका
मध्यप्रदेश, बिहार और गुजरात की एक एक विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा को करारा झटका लगा है। गौरतलब है कि इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है इसके बावजूद भाजपा सिर्फ गुजरात में हुए उपचुनाव में जीत हासिल करने में सफल हो पाई है। बिहार और मध्यप्रदेश में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा है जो भाजपा के लिए करारा झटका है। खासतौर पर बिहार की बांकीपूर सीट जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नवीन के राज्यसभा में जाने के कारण खाली हुई थी वहां भाजपा को पराजय का सामना कना पड़ा है।
इस सीट पर पिछले तीन दशकों से भाजपा का कब्जा रहा है और पिछले नौ चुनावों में भाजपा ने यहां से जीत हासिल की थी। खुद नीतिन नवीन इस सीट से पांच बार जीत चुके थे इसके बावजूद भाजपा का यह अभेद्यगढ़ ढह गया और यह चमत्कार भी एक नई नवेली जनसुराज पार्टी ने कर दिखाया। जिसके संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा प्रत्याशी को शिकस्त देकर शानदार जीत दर्ज की। यह वही जनसुराज पार्टी है जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में जितनी भी सीटों पर चुनाव लड़ा था उनमें से सिर्फ दो सीट को छोड़कर बाकी में उसकी जमानत जब्त हो गई थी। शायद यही वजह है कि भाजपा ने जनसुराज पार्टी के प्रत्याशी प्रशांत किशोर को हल्के में लेने की भूल की और उनके खिलाफ भाजपा ने एक अपेक्षाकृत कमजोर प्रत्याशी को मैदान में उतारने की नादानी की।
भाजपा ने पहले किसी और को प्रत्याशी बनाया था बाद में उसे बदलकर नीतीन नवीन की पसंद पर एक नये चेहरे पर दांव लगाया जो उसे महंगा पड़ा। प्रत्याशी बदलने के कारण बांकीपूर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हुआ जो भाजपा की हार का प्रमुख कारण बना। पिछले विधानसभा चुनाव में बांकीपूर विधानसभा सीट पर 41 प्रतिशत मतदान हुआ था जो उपचुनाव में घटकर सिर्फ 34 प्रतिशत रह गया। इसी से स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में नाराज भाजपा कार्यकर्ता और वोटर वोट देने ही नहीं निकले। नतीजतन भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। इस चुनावी नतीजे से भाजपा को सबक लेने की जरूरत है।
अब वे दिन हवा हुए जब पसीना भी गुलाब हुआ करता था। भाजपा की टिकट ही जीत की गारंटी नहीं रह गई है। यदि कार्यकर्ताओं की इच्छा को दरकिनार करके किसो को भी टिकट दे दिया जाता है तो उसकी हार निश्चित है। प्रशांत किशोर की इस जीत में भाजपा में उपजे असंतोष का बड़ा हाथ है। यदि भाजपा वहां कार्यकर्ताओं की पसंद को तरजीह देती तो निश्चित रूप से उसे अपनी यह परंपरागत सीट नहीं गवानी पड़ती। यह चुनावी नतीजा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नवीन के लिए भी बहुत बड़ा झटका है।
भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी सीट पर अपने पसंदीदा भाजपा प्रत्याशी को जीत नहीं दिला सका यह उनके नेतृत्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगाएगा। रही बात मध्यप्रदेश के तकिया विधानसभा सीट के उपचुनाव की तो वहां भी भाजपा को उसका अंतरकलह ही ले डूबा है। इस सीट से पिछला विधानसभा चुनाव मध्यप्रदेश के गृहमंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा हार गये थे और कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस प्रत्याशी के निधन के बाद यहां उपचुनाव हुए और भाजपा से नरोत्तम मिश्रा ही टिकट के प्रबल दावेदार थे लेकिन उनकी जगह दूसरे को प्रत्याशी बनाया गया जिसकी वजह से भाजपा में जमकर भीतर घात हुआ। बहरहाल गुजरात की एक सीट पर जीत दर्ज कर भाजपा ने अपनी इज्जत बचा ली है लेकिन उसे इन चुनावी नतीजों से सबक लेना चाहिए।



