छत्तीसगढ़

Live in Relationship : लिव इन संबंध को लेकर उच्च न्यायालय की अहम टिप्पणी, केवल शादी से इन्कार पर नहीं बनेगा यह मामला

लिव इन संबंधों से जुड़े एक मामले में उच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद कानूनी हलकों में चर्चा तेज (Live in Relationship) हो गई है। अदालत ने साफ किया है कि बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्ते को उसके पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए और बाद की परिस्थितियों के आधार पर हर मामले को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के बयान, उपलब्ध साक्ष्यों और ट्रायल कोर्ट के फैसले का विस्तार से परीक्षण किया। इसके बाद पीड़िता की ओर से दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया गया।

सहमति से बने लिव इन संबंध पर अदालत की टिप्पणी Live in Relationship

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से लिव इन संबंध में रहते हैं, तो यह माना जाएगा कि दोनों उस रिश्ते के परिणामों से परिचित थे। ऐसे मामलों में केवल बाद में शादी से इन्कार कर देने के आधार पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता। अदालत ने यह टिप्पणी भिलाई नगर निगम की एक महिला अधिकारी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए की।

फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा

यह मामला रायपुर के खम्हारडीह थाना क्षेत्र से जुड़ा है। महिला ने आरोप लगाया (Live in Relationship) था कि सिद्धार्थ सरांगी ने वर्ष 2019 से 2021 के बीच शादी का भरोसा देकर कई बार शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इन्कार कर दिया। इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने पहले ही आरोपित को बरी कर दिया था। उस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता ने उच्च न्यायालय में अक्विटल अपील दायर की थी।

अदालत में लिव इन संबंध की हुई पुष्टि

सुनवाई के दौरान पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि वह आरोपित के साथ लिव इन संबंध में रह चुकी थी। अदालत के समक्ष यह तथ्य भी सामने आया कि महिला आयोग में दोनों पक्षों के बीच 30 लाख रुपये लेकर विवाद समाप्त करने को लेकर सहमति जताई गई थी। इन तथ्यों पर विचार करने के बाद उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही माना और पीड़िता की अपील खारिज कर दी।

ट्रायल कोर्ट का फैसला रहेगा प्रभावी

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला (Live in Relationship) उचित है। इसलिए आरोपित को बरी करने वाले आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

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