Basmati Rice : अब हर खुशबूदार चावल नहीं कहलाएगा बासमती, सरकार बदल सकती है नियम, किसानों और निर्यातकों को होगा बड़ा फायदा
भारतीय बासमती चावल की पहचान को दुनिया भर में और मजबूत बनाने की तैयारी शुरू (Basmati Rice) हो गई है। लंबे समय से विदेशों में निर्यात होने वाली बासमती किस्मों को लेकर चल रही चर्चा के बीच केंद्र सरकार अब बड़ा बदलाव करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इस फैसले का सीधा असर किसानों, चावल कारोबारियों और निर्यातकों पर पड़ सकता है।
सरकार बासमती चावल की मान्यता प्राप्त किस्मों की समीक्षा कर रही है। मौजूदा समय में 45 सुगंधित किस्मों को बासमती के रूप में निर्यात की अनुमति है, लेकिन अब इस सूची को छोटा किया जा सकता है। उद्देश्य केवल उन्हीं किस्मों को प्राथमिकता देना है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में सबसे अधिक मांग और पहचान है।
क्यों बदले जा सकते हैं नियम Basmati Rice
बासमती चावल के निर्यातकों का कहना है कि बहुत अधिक किस्मों को एक साथ मान्यता मिलने से विदेशी खरीदारों के बीच भ्रम की स्थिति बनती है। कई खरीदार केवल कुछ प्रसिद्ध किस्मों को ही पहचानते हैं, जबकि नई किस्मों के अलग नाम होने से उनकी मार्केटिंग प्रभावित होती है। इसी वजह से सरकार बाजार की मांग के अनुसार मान्यता प्राप्त किस्मों की सूची तैयार करने पर विचार कर रही है, ताकि भारतीय बासमती की ब्रांड वैल्यू और मजबूत हो सके।
पूसा 1121 की सबसे ज्यादा पहचान
पूसा बासमती 1121 को दुनिया की सबसे लोकप्रिय बासमती किस्मों में माना जाता है। वर्ष 2005 में विकसित इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबाई है। पकने के बाद इसके दाने लगभग 22 मिलीमीटर तक लंबे हो जाते हैं, जबकि सामान्य मानक इससे काफी कम होता है।
यही कारण है कि विदेशों में इस किस्म की सबसे अधिक मांग (Basmati Rice) रहती है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान भी अपने सुगंधित चावल के विपणन में 1121 नाम का इस्तेमाल करता है।
नए नामों से बढ़ रही परेशानी
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान जब किसी पुरानी किस्म में सुधार कर नई किस्म विकसित करता है, तो उसे नया नाम या नया कोड (Basmati Rice) दिया जाता है। निर्यातकों का कहना है कि इससे विदेशी ग्राहकों के बीच भ्रम पैदा होता है। उनका सुझाव है कि नई किस्मों के नाम मूल लोकप्रिय किस्म से जुड़े रहने चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी पहचान आसानी से बन सके।
निर्यात को मिल सकता है बड़ा फायदा
चावल निर्यात क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पूसा 1121 जैसी लोकप्रिय किस्मों ने भारत के बासमती निर्यात को नई ऊंचाई तक पहुंचाया है। पिछले दो दशकों में बासमती निर्यात कई गुना बढ़ा है और अब इसकी वार्षिक कीमत 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नामकरण और मान्यता प्रणाली को बाजार की जरूरत के अनुसार बदला जाता है तो भारतीय बासमती की वैश्विक पहचान और मजबूत होगी।
सरकार और वैज्ञानिकों के बीच हुई चर्चा
हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण तथा बासमती निर्यातकों के बीच इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई है। फिलहाल अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि बासमती किस्मों की सूची और नामकरण व्यवस्था में बदलाव को लेकर जल्द आगे की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
किसानों को कैसे मिलेगा लाभ
यदि सरकार नई व्यवस्था लागू करती है तो भारतीय किसानों और निर्यातकों दोनों को फायदा मिल (Basmati Rice) सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की अलग और मजबूत पहचान बनेगी, खरीदारों का भरोसा बढ़ेगा और निर्यात में भी तेजी आने की संभावना है। इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने के साथ देश की विदेशी मुद्रा आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।



