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Volkswagen Layoffs : 89 साल में पहली बार ऐसा संकट, एक लाख कर्मचारियों पर लटकी नौकरी जाने की तलवार

दुनिया की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनियों में गिनी जाने वाली फॉक्सवैगन इन दिनों अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर (Volkswagen Layoffs) रही है। कभी यूरोपीय बाजार में दबदबा रखने वाली कंपनी अब लगातार बढ़ते दबाव से जूझ रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि लाखों कर्मचारियों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई है और कंपनी के भीतर बड़े फैसलों की तैयारी शुरू हो चुकी है।

बाजार में बढ़ते मुकाबले, घटती बिक्री और वैश्विक आर्थिक दबाव के बीच फॉक्सवैगन अब बड़े स्तर पर पुनर्गठन की योजना बना रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी अपने 89 साल के इतिहास की सबसे बड़ी छंटनी कर सकती है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो करीब एक लाख कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं और कई उत्पादन इकाइयों पर भी ताला लग सकता है।

चार फैक्टरी बंद करने की तैयारी Volkswagen Layoffs

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड के सामने जिन प्रस्तावों पर चर्चा होनी है, उनमें हनोवर, ज्विकाऊ, एम्डेन और ऑडी के नेकार्सुल्म प्लांट को बंद करने की योजना भी शामिल है। इन प्रस्तावों पर 9 जुलाई को होने वाली बोर्ड बैठक में फैसला लिया जा सकता है।

यदि इन फैक्ट्रियों को बंद करने की मंजूरी मिलती है तो लगभग 45 हजार कर्मचारियों की नौकरियों पर सीधा असर पड़ सकता है। इसके अलावा करीब 50 हजार अन्य पदों में कटौती को लेकर पहले ही कर्मचारी यूनियनों के साथ बातचीत हो चुकी है। ऐसे में कुल मिलाकर लगभग एक लाख कर्मचारियों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

निवेश में भी होगी बड़ी कटौती

कंपनी केवल कर्मचारियों की संख्या कम करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि आने वाले पांच वर्षों के लिए अपने निवेश में भी लगभग 15 प्रतिशत की कटौती करने की योजना बना रही है। इस फैसले के बाद कंपनी का कुल निवेश घटकर लगभग 130 अरब यूरो रह सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लागत कम करने और मुनाफे को संतुलित रखने के लिए कंपनी यह कदम उठा रही है।

चीनी कंपनियां बन रहीं सबसे बड़ी चुनौती

फॉक्सवैगन के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन की ऑटो कंपनियां बनकर (Volkswagen Layoffs) उभरी हैं। बीवाईडी, चेरी, एसएआईसी और लीपमोटर्स जैसी कंपनियां कम कीमत में आधुनिक तकनीक और बेहतर इलेक्ट्रिक वाहन पेश कर रही हैं। इसका सीधा असर फॉक्सवैगन की बिक्री पर पड़ा है।

इलेक्ट्रिक वाहनों के बाजार में चीनी कंपनियों ने तेज बढ़त बनाई है, जिससे फॉक्सवैगन का दबदबा लगातार कमजोर होता जा रहा है। पहले जहां चीन कंपनी का सबसे मजबूत बाजार माना जाता था, वहीं अब वहीं से सबसे बड़ी चुनौती मिल रही है।

चीन में लगातार घट रही बाजार हिस्सेदारी

रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष 2024 में बीवाईडी ने बिक्री के मामले में फॉक्सवैगन को पीछे छोड़ दिया। इसके बाद कंपनी की बिक्री में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। वर्ष 2020 में चीन के ऑटो बाजार में विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 57 प्रतिशत थी, जो अब घटकर लगभग 32 प्रतिशत रह गई है। इसका सबसे अधिक असर फॉक्सवैगन जैसी कंपनियों पर पड़ा है।

अमेरिका और यूरोप का भी बढ़ा दबाव

फॉक्सवैगन केवल चीन में ही नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी कई चुनौतियों का सामना (Volkswagen Layoffs) कर रही है। यूरोप में वाहनों की मांग पहले की तुलना में कमजोर हुई है, जबकि अमेरिका की ओर से लगाए जा रहे आयात शुल्क ने भी लागत और कारोबार पर असर डाला है।

कंपनी प्रबंधन ने भी स्वीकार किया है कि मौजूदा कारोबारी मॉडल पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, कम होती मांग और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण मुनाफे में गिरावट आई है। ऐसे में कंपनी अब बड़े स्तर पर पुनर्गठन कर अपने कारोबार को नई दिशा देने की तैयारी कर रही है।

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