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खबरों की मरम्मत: मंत्रालय की कैंटीन में ये काहे के गिलास हैं?..अब नहीं बनना है हमे एल्डरमैन

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मंत्रालय की कैंटीन में ये काहे के गिलास हैं?

क्या आप जानते हैं कि मंत्रालय के चौथे फ्लोर की कैंटीन में अब बीयर के गिलास में पानी मिलने लगा है? वो भी तब, जब आपको खाते-खाते ठसका लग जाए और पानी की तलाश में आप अपनी टेबल से उठकर काउंटर तक पहुंच जाएं; क्योंकि काउंटर पर ‘सेल्फ सर्विस’ का बोर्ड लगा रखा है। आप तो शुक्र मनाइए कि यह नहीं लिखा है कि ‘खाना घर से लेकर आएं, यहां सिर्फ खाने की सुविधा है और यहां बैठकर खाने का रेट इतना है।’ मात्र 52 रुपये में थर्ड क्लास सांभर-बड़ा के टेस्ट की आपने यदि शिकायत की, तो एफआईआर तक हो सकती है; क्योंकि काउंटर पर बैठा बंदा स्ट्रांग पॉलिटिकल सपोर्ट से वहां बैठा है। यदि उसकी बदतमीजी के जवाब में आपने एक शब्द भी कहा और आप मंत्रालय कर्मी या बाहर से डाक लेकर आए हुए सरकार के कर्मचारी हैं, तो न केवल आप सस्पेंड हो सकते हैं बल्कि आपकी विभागीय जांच तो तय मानकर चलिए। यदि इतना भी नहीं हो पाया, तो अगली बार के लिए मंत्रालय का पास बनेगा या नहीं, यह भी कैंटीन का ठेकेदार ही तय करने वाला है। यह बात अलग है कि मंत्रालय के फस्र्ट क्लास अफसर से लेकर फोर्थ क्लास कर्मचारी तक इस कैंटीन की थर्ड क्लास, गई-गुजरी सर्विस, क्वांटिटी, क्वालिटी, रेट, गंदगी और बदतमीजी से परेशान हैं; लेकिन मजाल है कि शिकायत करें! और करें तो करें किससे? जब बाड़ ही खेत को खाने लगे। केन्द्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ में सहकारिता को लेकर कितने गंभीर हैं, यह बात सत्ता और संगठन जानता है। लेकिन वे नहीं जानते, जिनको सहकारिता की साख बचाने के लिए कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है। दरअसल सहकारिता का यह नया मॉडल है। इससे पहले मंत्रालय और विधानसभा में ‘कॉफी हाउस’ नाम की सहकारी संस्था कैटरिंग का काम करती थी; फर्क सिर्फ इतना था कि वह प्रोटोकॉल मेंटेन करती थी। लेकिन सहकारिता से जुड़े एक नेता को इसमें इतना फायदा दिखा कि उसने सबसे पहले मंत्रालय और विधानसभा से इस सहकारी संस्था को बाहर कर नेस्तनाबूत किया, अपना बिजनेस मॉडल खड़ा किया, और इस डंके की चोट पर कि—है कोई माई का लाल, तो हटा के दिखाए व्यंकटेश को!

अब नहीं बनना है हमे एल्डरमैन

लंबे समय से एल्डरमैन बनने की बाट जोह रहे नगर स्तरीय भाजपा नेताओं की अब एल्डरमैन पद को लेकर दिलचस्पी कम होने लगी है। भाजपा सरकार के कार्यकाल का आधा समय पूरा होने जा रहा है। ऐसे में मात्र दो ढाई साल के लिए एल्डरमैन बनने से उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला है। एल्डरमैन पद की दौड़ में शामिल रहे और अपने आकाओं के बंगलों की परिक्रमा कर के थक चुके और उनके खोखले आश्वासन सुन सुनकर पक चुके कई नेताओं का कहना है कि अब उन्हें एल्डरमैन नहीं बनना है। चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात वाली कहावत को चरितार्थ करने से अच्छा है कि नेतागिरी का चक्कर छोड़ कर अपने काम धंधे पर ध्यान दिया जाए और चार पैसे कमाए जाएं। गौरतलब है कि इन नगरीय निकाय स्तरीय नेताओं को एल्डरमैन पद का लालीपॉप दिखाकर चुनाव के दौरान पार्टी के काम पर लगाया गया था। बेचारों ने तन, मन धन से पार्टी की सेवा की लेकिन एल्डरमैन पद उनके लिए मृगमरिचिका ही बना हुआ है। नतीजतन एल्डरमैन बनने के इच्छुक लोगों का अब इस पद से मोहभंग हो गया है।

स्टेटस सिंबल बने कैमरामैन

नेता-मंत्रियों के सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखने वाले मोबाइल, कैमरामैन और फोटोग्राफरों की भीड़ को देखकर आप एक्साइटेड मत हो जाइए; और यदि हो भी गए, तो इस गलतफहमी में तो बिल्कुल भी मत रहिए कि कहीं आप छपने या दिखने वाले हैं। दरअसल, मंच पर जितने नेता आपको दिखते होंगे, उससे दुगुने सोशल मीडिया कवर करने वाले उनके फोटोग्राफर और कंटेंट राइटर मीडिया के लाउंज में कब्जा जमाए मिलेंगे। दरअसल हो क्या रहा है? पहले नेता का स्टेटस सिंबल गनमैन हुआ करता था, अब कैमरामैन हो गया है; फिर चाहे वह प्रोफेशनल कैमरामैन हो या मोबाइल लेकर घूमने वाला। उसे निर्देश हैं कि नेता जी के मंदिर प्रवेश से पहले जूता उतारने, मोजा पहने रहने से लेकर मंदिर से बाहर वापस आने तक का कंटेंट पहले ही तैयार रखा जाए। मोबाइल या फोटो कैमरामैन तैयार रहे; मंत्री जी के गाड़ी में बैठते ही पोस्ट हो जाना चाहिए कि—राज्य की जनता की भलाई के लिए मंत्री ने भगवान से प्रार्थना की। इस प्रार्थना या कामना से राज्य की जनता का कितना भला हुआ, यह तो जनता जाने; लेकिन इस पोस्ट पर आने वाले कमेंट्स, लाइक्स और शेयर्स मंत्री जी का राजनीतिक भविष्य तय करते हैं। आभासी दुनिया को जीने वाले लोग यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि रोटी गूगल से कभी डाउनलोड नहीं होगी।

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना ऐसे मनमौजी को मुश्किल है समझाना… यह पुराना गाना आज भी जब तब गुनगुनाया जाता है तो उसकी वजह यही है कि ऐसे दीवाने अब्दुल्लाओं की तादाद बढ़ती जा रही है। जिनकी खुद की शादी भले ही न हो पा रही हो लेकिन वे मान न मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर किसी की भी बारात में लूंगी डांस करने पहुंच जाते हैं। उनका मानना है कि शादी किसी की भी हो लेकिन नाचेंगे वे ही। सोशल मीडिया पर काकरोच जनता पार्टी ने जो गंध फैलाई है उससे छत्तीसगढ़ के भी कुछ काकरोच नाली से बाहर निकल कर झींगा.. ला.. ला… हू… हू… करने लगे है। ऐसी ही एक छोटी सी पार्टी के बड़े नेता ने काकरोच जनता पार्टी का समर्थन किया है और उसकी शान में कसीदे पढ़े है। हो सकता है कि अपनी स्वनामधन्य पार्टी की कहीं और दाल न गलती देखकर वे इसका विलय काकरोच जनता पार्टी में कर दें। या फिर काकरोच जनता पार्टी की तरह वे जोंक कांग्रेस पार्टी बना लें और गला फाड़कर गाने लगे कि -मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा.. तिक ताकड़ धूम…ई..स.. ई…।

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लगे लाखों पौधे

पर्यावरण दिवस पर फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर जो पौधे लगते हैं, वे असल में कितने दिनों तक जिंदा रहेंगे, इसकी पड़ताल करने की जरूरत है। केवल पौधे लगाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देने भर से पर्यावरण दिवस नहीं मन जाता। एक पौधे को वृक्ष बनने में सालों लग जाते हैं, लेकिन ये सोशल मीडिया-जीवी लोग हर साल अपने स्टेटस और विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स व समाचार पत्रों के माध्यम से केवल सुर्खियां बटोरते है और फोटो प्रदर्शन करते हैं। इसके विपरीत, बस्तर में एक संगठन है जो वृक्षारोपण करते समय उन पौधों को अपने माता, पिता या भाई-बहन का नाम देता है और उनके वृक्ष बनने तक उनका पूरा पालन-पोषण करता है। यह उन लोगों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं है जो सोशल मीडिया पर फोटो लगाकर केवल लाइक्स बटोरते हैं। यहाँ बात सोशल मीडिया या वृक्षारोपण के विरोध की नहीं है, बल्कि पौधा लगाकर जिम्मेदारी निभाने की है। पौधे को बाल्यावस्था से लेकर वृक्ष बनने तक संभालना और उसका लालन-पालन करना बेहद जरूरी है। वृक्षारोपण केवल स्टेटस, स्टोरी और फोटो प्रदर्शनी तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरी जिम्मेदारी के साथ उसे बड़ा और तंदुरुस्त करने का संकल्प होना चाहिए।

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