छत्तीसगढ़

Khamhibazar Bull Market: बैलों की टाप, गले में बंधे घुंघरू, कौडिय़ों की माला और हजारों की भीड़… अब सिर्फ यादों में बचा खाम्हीबाजार

-Khamhibazar Bull Market: 3 दशक पहले 2 से 3 लाख रुपये मिलता था बाजार से गांव को राजस्व

-बाजार में बैलों की जगह अब बकरियों की मिमियाहट सुनाई दे रही

सुशील शुक्ल

मुंगेली/नव प्रदेश। खाम्हीबाजार… कभी यहां सुबह होते ही चारों तरफ बैलों (Khamhibazar Bull Market) की रंभाहट सुनाई देती थी। रंग-बिरंगे सींग, गले में बंधे घुंघरू और कौडिय़ों की मालाओं से सजे मवेशी बाजार की रौनक देखते ही बनती थी। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा तक के व्यापारी अपने मवेशी लेकर यहां पहुंचते थे। खरीदारों की भीड़ उमड़ती थी… हर मंगलवार खाम्हीबाजार मानो पूरे इलाके का पशु कारोबार का केंद्र बन जाता था। आज तस्वीर बदल गई है… बैलों की टापें थम गई और उनकी जगह बाजार में बकरियों की मिमियाहट ज्यादा सुनाई देती है। इसे विडंबना ही कहें… वक्त बदला तो खेतों में बैलों की जगह ट्रैक्टर उतर आए।

मशीनों ने खेती आसान कर दी, लेकिन धीरे-धीरे खाम्हीबाजार की उस पुरानी दुनिया को भी पीछे छोड़ दिया, जिसकी पहचान ही मवेशी बाजार से बनी थी। आज उसी बाजार में गाय, बैल और भैंसों की जगह बकरियों के झुंड नजर आते हैं। बाजार अब भी लगता है, लोग अब भी आते हैं, पंचायत को अब भी इससे आय होती है… मगर वह आवाज नहीं लौटती, जो कभी इस गांव की धड़कन (Khamhibazar Bull Market) हुआ करती थी। करीब 36 साल पहले शुरू हुआ यह मवेशी बाजार सिर्फ पशुओं की खरीद-बिक्री की जगह नहीं था। इसी बाजार ने ‘खाम्ही’ को ‘खाम्हीबाजार’ बना दिया। कभी पंचायत की आय का बड़ा जरिया रहे इस बाजार ने गांव को दूर-दराज के इलाकों तक पहचान दिलाई। आज बाजार की रौनक भले ही कम हो गई हो, लेकिन हर मंगलवार यहां लौटती भीड़ के बीच अतीत की वह कहानी अब भी सांस लेती है। एक ऐसे दौर की कहानी, जब बैल सिर्फ मवेशी नहीं, किसान की ताकत और गांव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करते थे।

1990 में शुरू हुआ यह बाजार

लोरमी ब्लॉक का गोंड खाम्हीबाजार कभी अपने मवेशी बाजार के कारण दूर-दूर तक पहचाना जाता था। करीब 1165 की आबादी वाले इस गांव की पहचान इतनी मजबूत हुई कि लोग गांव का नाम ही खाम्ही के बजाय खाम्हीबाजार (Khamhibazar Bull Market) कहने लगे। वर्ष 1990 में शुरू हुआ यह बाजार करीब चार एकड़ में फैलता था मवेशी बाजार की लोकप्रियता बढ़ी तो बेड़ापारा, गाड़ापारा, तेली खाम्ही और गोविंदपुर जैसे गांव भी पंचायत से जुड़े रहे हैं। तेली खाम्ही में साहू समाज की बहुलता होने के कारण उसका नाम भी इसी आधार पर प्रचलित हुआ।

1000 मवेशियों की खरीद-बिक्री आम बात थी

खाम्हीबाजार में 800 से 1000 तक मवेशियों की खरीद-बिक्री होना आम बात थी। कनपुरिया, देशी, हल्दी, भंडारा सहित कई नस्लों के बैल यहां पहुंचते थे। किसानों के लिए यह बाजार किसी मेले से कम नहीं था। खेती के लिए अच्छा बैल मिल जाए तो किसान की चिंता खत्म…। दूसरे राज्यों से लोग बाजार की रौनक देखने पहुंचते थे। सजाए गए बैलों के सींग, घुंघरुओं की आवाज और पशु व्यापारियों की आवाजाही पूरे माहौल को जीवंत बना देती थी।

पंचायत को हर साल 8 से 10 लाख तक का राजस्व

सरपंच रमेश मरावी बताते हैं कि इस बाजार की धमक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी ग्राम पंचायत को इससे हर साल 8 से 10 लाख रुपये तक का राजस्व (Khamhibazar Bull Market) मिलता था। पंचायत के लिए यह बाजार सिर्फ खरीद-बिक्री की जगह नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था और ग्राम पंचायत की कमाई का बड़ा जरिया था। पूर्व ग्राम प्रमुख सुरजीत सिंह के अनुसार, तीन-चार दशक पहले भी बाजार से पंचायत को 2 से 3 लाख रुपये तक की आय होती थी।

बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने कब्जा जमा लिया

खेतों में बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने कब्जा जमा लिया। जुताई के लिए बैल रखने की जरूरत कम हुई तो मवेशियों की मांग भी घटने लगी। जो व्यापारी कभी ट्रकों और पैदल मवेशियों के झुंड लेकर खाम्हीबाजार पहुंचते थे, उनकी आवाजाही कम होती गई। देखते ही देखते बाजार की पुरानी चमक फीकी पडऩे लगी। आज बाजार में पहले जैसी हजारों मवेशियों की भीड़ नहीं जुटती। गाय, बैल और भैंसों की जगह अब बकरियों ने बाजार में अपनी जगह बना ली है। जिस बाजार की पहचान कभी बैलों-भैंसों के दमदार सींगों से थी, वहां अब बकरियों के झुंड नजर आते हैं।

Hemant Dhote

लेखक: हेमन्त धोटे छत्तीसगढ़ के एक सक्रिय पत्रकार और प्रिंट मीडिया से जुड़े व्यक्ति हैं, जो मुख्य रूप से रायपुर से संचालित होने वाले प्रतिष्ठित दैनिक हिंदी समाचार पत्र 'दैनिक नव प्रदेश' (Nav Pradesh) में निरंतर वरिष्ठ प्रबंधन/प्रतिनिधि मंडल एवं रायपुर ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं और अखबार के विभिन्न आयोजनों व गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। श्री हेमन्त धोटे ने रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (KTUJM) से (बी.जे.एम.सी और एम.ए.एम.सी) की पढ़ाई की है।

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