
50 की उम्र से पहले झुक रहे लोग, स्कूलों में बच्चों के दांत सड़ रहे
प्रशासनिक दावों के बीच 5 हजार की आबादी पर स्वास्थ्य संकट
कोरबा/नवप्रदेश। कोरबा जिले के पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक के 15 गांवों की तस्वीर किसी त्रासदी से कम नहीं है। पानी, जो जीवन देता है, वहां के लोगों के लिए ‘धीमा जहर बन चुका है। पोड़ी उपरोड़ा की यह चीख व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है। जब तक शुद्ध पेयजल की पहुंच हर घर तक सुनिश्चित नहीं होती, तब तक इन गांवों के लोगों के लिए ‘अमृतÓ (पानी) ही उनकी मौत और अपंगता का कारण बना रहेगा। यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट है, जिस पर तत्काल कार्रवाई की दरकार है।
आकांक्षी ब्लॉक का तमगा पाने वाला पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड आज एक ऐसे जल संकट से जूझ रहा है, जिसने यहां की पूरी पीढ़ी को बीमार बना दिया है। विकासखंड के 15 गांवों में ग्रामीण मजबूरी में फ्लोराइड युक्त पानी पी रहे हैं। इसका असर अब केवल दांतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं और बुजुर्गों की हड्डियां तक टेढ़ी हो रही हैं। कई ग्रामीण 50 वर्ष की उम्र से पहले ही झुककर चलने को मजबूर हैं, तो कई लाठी के सहारे जिंदगी काट रहे हैं। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आमाटिकरा प्राथमिक शाला में दर्ज 50 बच्चों में से 35 बच्चों के दांत खराब पाए गए। गांव वालों और स्कूल शिक्षकों को तक यह जानकारी नहीं थी कि वे जिस पानी का उपयोग कर रहे हैं, वह फ्लोराइड से प्रदूषित है।
पांच हजार आबादी पर मंडरा रहा खतरा
पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड के आमाटिकरा, फुलझर, कोरबी, मातीन, अमहवा, केशलपुर, पंडरीपानी, कौआताल, बिंझरा समेत 15 गांव फ्लोराइड प्रभावित बताए गए हैं। इन गांवों की कुल आबादी लगभग पांच हजार है, जिनमें करीब 10 प्रतिशत लोग आंशिक या पूर्ण रूप से फ्लोरोसिस की चपेट में आ चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे यही पानी पीने को मजबूर हैं। विकल्प नहीं होने के कारण नई पीढ़ी भी उसी बीमारी की ओर बढ़ रही है, जिसने पुरानी पीढ़ी को विकलांग बना दिया।
आकांक्षी ब्लॉक, लेकिन पीने को सुरक्षित पानी नहीं
पोड़ी उपरोड़ा देश के आकांक्षी ब्लॉकों में शामिल है, जहां केंद्र और राज्य सरकार विकास योजनाओं के बड़े दावे करती हैं। इसके बावजूद यहां आज भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। पीएचई विभाग ने कुछ हैंडपंप बंद कराने और पांच गांवों में फ्लोराइड रिमूवल प्लांट लगाने का दावा किया है, लेकिन प्रभावित गांवों की संख्या 15 है। कई स्थानों पर लगाए गए रिमूवल प्लांट भी अब बंद पड़े हैं या प्रभावी नहीं रह गए। ग्रामीणों को दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है।
पानी नहीं, धीरे-धीरे फैलता जहर
पीएचई विभाग के अनुसार पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक होने पर उसे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है। प्रभावित गांवों में कई जगह यह मात्रा 1.7 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से दांत पीले और कमजोर हो जाते हैं। बाद में यह बीमारी हड्डियों को प्रभावित करती है। शरीर अकडऩे लगता है, रीढ़ झुक जाती है और व्यक्ति धीरे-धीरे चलने-फिरने में असमर्थ होने लगता है। पोड़ी उपरोड़ा के कई गांवों में यही तस्वीर अब आम हो चुकी है।
कुएं बने जीवन का सहारा
क्षेत्र में हैंडपंप और गहरे बोरवेल का पानी सबसे ज्यादा प्रभावित है। डेढ़ सौ से दो सौ फीट की गहराई से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक पाई जा रही है। इसके उलट 50 से 55 फीट गहराई वाले कुओं के पानी में फ्लोराइड कम या नगण्य है। इसी वजह से कई गांवों में कुएं ग्रामीणों के लिए राहत बने हुए हैं। पंडरीपानी और बिंझरा में मनरेगा से बने कुओं का उपयोग लोग पीने के पानी के लिए कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सभी प्रभावित गांवों में व्यवस्थित रूप से कुएं बनाए जाएं और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए तो इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
सबसे बड़ा संकट: जागरूकता की कमी
स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि लोगों को यह तक नहीं पता कि वे बीमार क्यों हो रहे हैं। एक स्वयंसेवी संस्था की टीम जब आमाटिकरा प्राथमिक शाला पहुंची, तब शिक्षकों और ग्रामीणों ने पहली बार जाना कि उनके गांव का पानी फ्लोराइडयुक्त है। स्कूल में बड़ी संख्या में बच्चों के खराब दांत इसी बीमारी का संकेत निकले। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जागरुकता नहीं फैलाई गई, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
वर्जन : – फ्लोराइडयुक्त पानी नहीं पीना ही समाधान
प्रभावित गांवों में समय-समय पर दंत रोग और हड्डी रोग विशेषज्ञों की टीम कैंप लगाती है। ग्रामीणों को दूषित पानी का उपयोग नहीं करने की सलाह भी दी जाती है। फ्लोरोसिस का सबसे प्रभावी और स्थायी समाधान फ्लोराइडयुक्त पानी का उपयोग बंद करना है। – डॉ. दीपक सिंह, बीएमओ, पोड़ी उपरोड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के के अनुसार
वर्जन : – समूह जल प्रदाय योजना से समाधान
प्रभावित गांवों में कुछ फ्लोराइड रिमूवल प्लांट लगाए गए हैं। एक प्लांट पर लगभग 14 लाख रुपये खर्च होते हैं। अब इन गांवों को समूह जल प्रदाय योजना से जोडऩे की प्रक्रिया चल रही है, ताकि ग्रामीणों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाया जा सके। – रमन उरांव, कार्यपालन अभियंता, पीएचई विभाग, कोरबा



