संपादकीय: पुरुषों के खिलाफ नारेबाजी के मायने
देश की राजधानी नई दिल्ली पर एक यूनिवर्सिटी की हजारों छात्राओं ने पुरुषों के खिलाफ नारेबाजी कर सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। एक कचौड़ी दो समोसा, मर्दों का क्या भरोसा से लेकर एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय-हाय तक कई नारे गढ़े गए हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। पुरुषों ने भी लगे हाथ महिलाओं के खिलाफ भी इससे मिलते जुलते नारे बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। जिसे देखकर लगता है मानो दोनों के बीच अंताक्षरी चल रही है या फिर कव्वाली का मुकाबला हो रहा है। छात्राओं द्वारा ईजाद किए गए नारों का बहुत से लोग समर्थन कर रहे हैं तो बहुत सारे लोग इसका विरोध कर रह रहे हैं।
लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि पुरुषों के खिलाफ इस तरह के नारों के मायने आखिर क्या हैं? इन नारों का विरोध करने वालों का तर्क है कि कुछ मर्दों की काली करतूत के लिए पूरी पुरुष जाति पर आक्षेप लगाना गलत है। जो लड़कियां इस तरह के नारे लगा रही हैं क्या उनके घर में भाई या बाप नहीं है? यदि है तो क्या उन्हें अपने भाई और पिता पर भी भरोसा नहीं है। सीमा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाले फौजी भी पुरुष हैं क्या इन फौजियों पर भी लड़कियों को भरोसा नहीं है?
वहीं दूसरी ओर ऐसा नारा लगाने वाली छात्राओं और उनका समर्थन करने वाले यह तर्क दे रहे हैं कि यह नारे सभी पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि उन पुरुषों के खिलाफ है जो महिलाओं को अपमानित और प्रताडि़त करते हैं। यदि ऐसा है तो नारे में स्पष्टता होनी चाहिए। नारे तो ऐसे गढ़े गए हैं मानो पूरी पुरुष जाति ही अपराधी है। यह ठीक है कि पुरुष प्रधान इस समाज में आज भी महिलाओं को उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। महिलाओं के प्रति हिंसा और अपराध के मामले भी बढ़ रहे हैं। महिलाएं खुद को घर और बाहर कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रही है लेकिन इसके लिए पूरी पुरुष जाति पर आक्षेप नहीं लगाना चाहिए।
पिता, पति, भाई और दोस्त के रूप में वही पुरुष महिलाओं की रक्षा भी तो करता है। भारतीय संविधान ने पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार दिए हैं। महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया भी बदल रहा है। महिलाओं के प्रति हिंसा रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान भी किए गए हैं। इसके बावजूद महिलाएं अपमानित और किसी भी रुप में प्रताडि़त हो रही हैं तो उन्हें अन्याय और अत्याचार का विरोध करने का पूरा अधिकार है। उन्हें अपनी लड़ाई लडऩे के लिए आगे आना भी चाहिए लेकिन पूरी पुरुष जाति को कटघरे में नहीं खड़ा चाहिए।



