झारखण्ड

Sarna Identity Politics : झारखंड में फिर तेज हुई ‘सरना बनाम सनातन’ की जंग!

झारखंड में एक बार फिर सरना धर्म कोड को लेकर सियासी और वैचारिक बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री Hemant Soren ने आगामी जनगणना में आदिवासी समुदाय के लिए अलग “सरना धर्म कोड” की मांग दोहराते हुए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। इसके बाद राज्य की राजनीति में “सरना बनाम सनातन” की बहस फिर केंद्र में आ गई है।

झारखंड सरकार का कहना है कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान लगातार कमजोर हो रही है और उसे संवैधानिक पहचान मिलनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर संघ और उससे जुड़े संगठनों का तर्क है कि सरना कोई अलग धर्म नहीं बल्कि जीवन पद्धति और प्रकृति पूजा की परंपरा है, जो भारतीय सनातन संस्कृति का ही हिस्सा है।

2020 में विधानसभा से पास हुआ था प्रस्ताव : Sarna Identity Politics

झारखंड विधानसभा ने वर्ष 2020 में सर्वसम्मति से सरना-आदिवासी धर्म कोड प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। उस समय इसे आदिवासी पहचान की ऐतिहासिक पहल माना गया था। हालांकि पांच साल बाद भी इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।

मुख्यमंत्री Hemant Soren का कहना है कि वर्ष 2011 की जनगणना में अलग कॉलम नहीं होने के बावजूद करीब 50 लाख लोगों ने स्वयं को “सरना” धर्मावलंबी बताया था। उनका दावा है कि आदिवासी परंपराओं और सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाने के लिए अलग धर्म कोड बेहद जरूरी है।

RSS ने कहा- “सरना अलग धर्म नहीं

इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख Mohan Bhagwat का बयान भी चर्चा में है। उन्होंने कहा कि सरना कोई अलग धर्म नहीं बल्कि पूजा-पद्धति है। उनका कहना था कि हिंदुत्व किसी एक पूजा पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि साथ रहने की जीवनशैली है।

इसी बीच “सरना-सनातन एक है” अभियान भी कई क्षेत्रों में चलाया जा रहा है। इस अभियान से जुड़े लोग आदिवासी परंपराओं और सनातन संस्कृति को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताते हैं।

आदिवासी संगठनों का पलटवार

हालांकि कई आदिवासी संगठनों और नेताओं ने इस विचार का विरोध किया है। पूर्व मंत्री Geetashree Oraon ने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है, जबकि सनातन परंपरा मूर्ति पूजा आधारित है। ऐसे में दोनों को एक बताना आदिवासी दर्शन और परंपरा की अनदेखी है।

वहीं आदिवासी नेताओं का कहना है कि 1961 की जनगणना के बाद आदिवासियों की अलग धार्मिक पहचान खत्म कर उन्हें “अन्य” श्रेणी में डाल दिया गया था। उनका सवाल है कि जब जैन और बौद्ध समुदाय को अलग धार्मिक पहचान मिल सकती है, तो आदिवासी समाज को क्यों नहीं?

BJP भी विरोध में नहीं, लेकिन धर्मांतरण पर फोकस

झारखंड भाजपा ने भी सीधे तौर पर सरना धर्म कोड का विरोध नहीं किया है। नेता प्रतिपक्ष Babulal Marandi का कहना है कि इससे आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण में मदद मिल सकती है। हालांकि भाजपा लगातार धर्मांतरण के मुद्दे को भी इससे जोड़ रही है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि तेजी से हो रहे धर्मांतरण के कारण आदिवासी समाज अपनी मूल परंपराओं से दूर होता जा रहा है।

जनगणना से पहले फिर गरमाई बहस

जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही यह मुद्दा फिर राजनीतिक तापमान बढ़ा रहा है। आदिवासी संगठनों का दावा है कि इस बार बड़ी संख्या में लोग स्वयं को “सरना” या “आदिवासी धर्म” के रूप में दर्ज कराएंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस अब सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं रही, बल्कि देशभर के आदिवासी क्षेत्रों में पहचान, संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।

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