NDA Majority : संसद में बड़े गणित की तैयारी क्यों तेज हुई, क्या अब बदल सकता है शक्ति संतुलन
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सांसदों की हलचल और बदलते समीकरण सबसे ज्यादा चर्चा का विषय (NDA Majority) बने हुए हैं। अलग अलग दलों के नेताओं की लगातार बैठकों और संभावित राजनीतिक बदलावों को लेकर अटकलों का दौर जारी है। माना जा रहा है कि आने वाले संसद सत्र से पहले कई बड़े फैसले देश की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने अपने संख्याबल को मजबूत करने में जुटे हैं। हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि अब लड़ाई केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद में संख्या बढ़ाने की रणनीति भी उतनी ही अहम हो गई है।
संविधान संशोधन के बाद बदली रणनीति NDA Majority
महिलाओं को तत्काल प्रभाव से 33 प्रतिशत आरक्षण देने और उसे लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने से जोड़ने वाला संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक दो तिहाई समर्थन नहीं मिलने के कारण पारित नहीं हो सका था। इसके बाद सत्तारूढ़ गठबंधन ने संसद के दोनों सदनों में अपना संख्याबल बढ़ाने की कोशिशें तेज कर दी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब केवल साधारण बहुमत नहीं, बल्कि भविष्य के बड़े विधेयकों के लिए मजबूत बहुमत जुटाना सरकार की प्राथमिकता बन गया है।
शिवसेना और तृणमूल में बढ़ीं चर्चाएं NDA Majority
महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट के कुछ सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है। दावा किया जा रहा है कि आवश्यक संख्या पूरी होने की स्थिति में सांसद अलग रास्ता अपना सकते हैं।
उधर पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के नए राजनीतिक समीकरण बनाने की खबरों ने संसद के संभावित गणित को लेकर नई बहस (NDA Majority) छेड़ दी है।
राज्यसभा में भी बदला संतुलन
हाल में हुए राज्यसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अधिकांश सीटों पर सफलता हासिल की। इससे उच्च सदन में भी गठबंधन की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत मानी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि आने वाले समय में कुछ और बदलाव होते हैं तो सरकार के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाना पहले से आसान हो सकता है।
विपक्ष के सामने नई चुनौती
विपक्ष के कई दल इस समय आंतरिक चुनौतियों से भी जूझ रहे हैं। कुछ राज्यों में चुनावी हार के बाद नेताओं और सांसदों के भविष्य को लेकर अटकलें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में विपक्ष के लिए अपने सहयोगियों और सांसदों को एकजुट बनाए रखना बड़ी चुनौती माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि विपक्ष में टूटफूट जारी रहती है तो संसद के भीतर उसका प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।
क्यों अहम है दो तिहाई बहुमत
संविधान में संशोधन के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं (NDA Majority) होता। इसके लिए दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि संसद के भीतर हर सांसद का समर्थन अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आने वाले महीनों में यदि राजनीतिक दलों के बीच नए समीकरण बनते हैं तो उनका असर केवल संसद की कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य के बड़े संवैधानिक और राजनीतिक फैसलों पर भी पड़ सकता है।



