राजनीति

Goa Election : गोवा की सियासत में नए दांव से बढ़ी हलचल, क्या सहयोगी दल ही बढ़ाएगा सत्ताधारी दल की मुश्किल

गोवा की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले नई हलचल दिखाई देने (Goa Election) लगी है। सत्ताधारी दल के साथ लंबे समय से जुड़े सहयोगी की नई रणनीति ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज कर दी हैं। माना जा रहा है कि आने वाले चुनाव में यह कदम कई सीटों पर मुकाबले का समीकरण बदल सकता है।

राज्य में अभी चुनाव में समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी बीच एक बड़े सहयोगी दल के अलग चुनाव लड़ने की तैयारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या इससे सबसे ज्यादा असर उसी दल पर पड़ेगा, जिसकी सरकार फिलहाल गोवा में सत्ता संभाल रही है।

30 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी Goa Election

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना गोवा की 40 में से करीब 30 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है। पार्टी का मकसद महाराष्ट्र से बाहर अपना राजनीतिक आधार मजबूत करना है और गोवा को इस विस्तार की पहली बड़ी शुरुआत माना जा रहा है।

पार्टी ने चुनावी अभियान की जिम्मेदारी पूर्व सांसद गजानन कीर्तिकर, दिलीप नाइक और राजू पेडणेकर को सौंपी है। उत्तर और दक्षिण गोवा में संगठन को मजबूत करने के साथ स्थानीय मुद्दों पर फोकस किया जा रहा है।

स्थानीय मुद्दों पर रहेगा जोर

शिवसेना का अभियान स्थानीय लोगों के अधिकार, रोजगार में प्राथमिकता और मराठी भाषी तथा हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने पर केंद्रित रहेगा। पार्टी का कहना है कि वह लंबे समय तक केवल चुनाव के दौरान सक्रिय (Goa Election) रहती थी, लेकिन इस बार कई महीने पहले से संगठन विस्तार का काम शुरू कर दिया गया है। गोवा में पार्टी कार्यालय खोला गया है और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के जरिए लोगों के बीच पहुंच बनाने की कोशिश की जा रही है।

पहले भी आजमाया था चुनावी दांव

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में अविभाजित शिवसेना ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में शिवसेना ने 10 उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे केवल 0.18 प्रतिशत वोट मिले और कोई सीट हासिल नहीं हुई।

महाराष्ट्र के बाहर विधानसभा चुनाव में पार्टी को अब तक सिर्फ एक बार जीत मिली है। वर्ष 1991 में उत्तर प्रदेश की एक सीट पर उसके उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी।

सत्ताधारी दल की चिंता क्यों बढ़ सकती है

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिवसेना यदि मराठी भाषी और हिंदू मतदाताओं के बीच प्रभाव बनाती है तो इसका असर सत्ताधारी दल के परंपरागत वोट बैंक पर पड़ सकता है। दोनों दल राष्ट्रीय स्तर पर एक गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन गोवा में अलग अलग चुनाव लड़ने की रणनीति मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है।

पार्टी के नेताओं का दावा है कि वे मजबूत स्थानीय चेहरों को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं और बूथ स्तर तक संगठन तैयार किया जा रहा है।

भाषा का मुद्दा भी बन सकता है चुनावी हथियार

गोवा में मराठी और कोंकणी भाषा का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा (Goa Election) रहा है। मराठी को सह आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग फिर से उठने लगी है, जबकि कोंकणी समर्थक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।

भाषा को लेकर दोनों पक्षों की सक्रियता चुनावी माहौल को और गर्म कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा कई क्षेत्रों में मतदाताओं की पसंद को प्रभावित कर सकता है।

बदल सकते हैं चुनावी समीकरण

विधानसभा चुनाव से पहले शिवसेना की सक्रियता ने गोवा की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। यदि पार्टी बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारती है तो कई सीटों पर वोटों का बंटवारा देखने को मिल सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में गोवा की चुनावी तस्वीर और दिलचस्प होने की संभावना जताई जा रही है।

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