baton baton main: किसानों की नई मुसीबत चना हटा, अफसरों का टोटा, विवेक बहुत ही पेशेवर

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सुकांत राजपूत

केसीसी से चना गायब

baton baton main: एक तरफ सूबे के अन्नदाताओं के लिए कांग्रेस सरकार किए वादों को निभाते-निभाते दुबली हो गई है। आर्थिक चुनौतियां तो बेशुमार हैं ही अब किसानों की एक नई मुसीबत का भी उसे सामना करना होगा। सरकार के लिए मुसीबत और किसानों के लिए नाराजगी का कारण बन रही है केसीसी यानि कि किसान क्रेडिट कार्ड!

दरअसल बैंकों ने यह व्यवस्था दी है कि किसानों को धान, चना फिर गन्ना तीन फसलों के लिए केसीसी दी जाती थी। (baton baton main) अब यक-बा-यक सभी बैंकों ने चना को केसीसी से डिलीट कर दिया है। पहले से ही धान की दिवाली के बाद खरीदी से खफा अन्नदाताओं ने खेत काट लिया है और उसे अब चना उगाना है। परंतु केसीसी के तीन फसलों के कॉलम से अब चना हटा दिया गया है।

रमन टाइम की मुसीबत

पूर्ववर्ती सरकार के वक्त की कई ऐसी परंपराएं वर्तमान सरकार के लिए मुसीबतें पैदा कर रही हैं। किसान क्रेडिट कार्ड में धान, चना फिर गन्ना को शामिल किया गया था जो अब बैंक ने हटा दिया है।

इसके अलावा उस वक्त नौकरशाहों की भरमार थी। (baton baton main) अब के दौर में अफसरों का टोटा है। ऐसे में जोगी शासनकाल में कमिश्नरी प्रथा समाप्त कर दी गई थी। जिसे रमन सरकार ने फिर से शुरु कर प्रिय-अप्रिय टाइप के अफसरों को एडजस्ट किया था।

लेकिन अभी अफसर हैं नहीं और बस्तर और दुर्ग कमिश्नर का पद लंबे वक्त से रिक्त है। सवाल यह है कि शासन यहां बिठाने के लिए अफसर कहां से लाए? आमतौर पर प्रमोटी या फिर जिसे निपटाना हो उसे यहां भेजने की परंपरा रही है। भाप्रसे. से आए सीधी भर्ती को तैनाती देना मुनासिब नहीं। फिर रमन सरकार का स्काई वॉक, एक्सप्रेस-वे जैसे कई निर्माण से भी नफा कम नुक्सान ज्यादा है।

किस्मत हो तो विवेक सी

सूबे के सबसे आला नौकरशाहों में सबसे ज्यादा किस्मत कनेक्शन देखें तो सिर्फ और सिर्फ विवेक ढांड का ही नाम आता है। पहले से ही लैंड लॉर्ड विवेक बहुत ही पेशेवर और शार्प आईएएस में शुमार हैं।

उस पर उनकी किस्मत सेवा में रहते हुए भी और सेवानिवृत्ति के पश्चात भी देखकर पूर्व के सभी मुख्य सचिव रश्क ही करेंगे। (baton baton main) हो भी क्यों न, एकमात्र छत्तीसगढिय़ा अफसर हैं वो जो राज्य निर्माण के बाद कलेक्टर से लेकर मंत्रालय तक हिंदी, इंग्लिश ही नहीं ठेट छत्तीसगढ़ी में भी बात करते थे।

नौकरशाहों में अगर उन्हें नेपोलिय बोनापार्ट जैसी कामयाबी का सेहरा पहनाएं तो वह नाकाबिल नहीं होगा। लंबे समय तक सीएस रहने वाले और सेवानिवृत्ति के साथ ही रेरा जैसी संस्थान का जिम्मा मिलना सच में किस्मत और कनेक्शन वाली चमात्कार है।

उनके पहले वाले आला नौकरशाहों जैसे पी.जॉय उम्मेन, बीकेएस रे के हाल से तो सभी वाकिफ हैं। ढांड सी कार्यशैली और कई मायनों में उनसे भी तेज सीएस आरपी मंडल 30 नवंबर को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। हम तो बस दुआ कर सकते हैं उन्हें उनके रुतबे के मुताबिक ही पद मिले।

जोगी बंगला भी जद में..

पहले जाति फिर मरवाही अब जोगी बंगला भी टारगेट में है। बंगला टारगेट में आने की वजह सियासी नहीं तकनीकि है। सरकारी जमीन में कमर्शियल प्लानिंग समेत कई योजनाएं हैं। इसी योजना के तहत सागौन बंगला भी इसकी जद में है।

यहां संचालित पीडब्ल्यूडी का संभागीय कार्यपालन यंत्री कार्यालय खाली करवा दिया गया है। इसके अंतगर्त तीन उपसंभाग कार्यालय भी पुराना ईएनसी कार्यालय परिसर में शिफ्ट हो चुका है। परिसर में रहने वाले स्टाफ क्वार्टरों, चतुर्थ श्रेणि के पूर्व कर्मचारियों के परिजनों तक को नोटिस थमा दी गई है।

ऐसे में जोगी बंगला भी इसी दायरे में है। मरवाही उपचुनाव के परिणाम और दिवाली के बाद कुछ भी हो सकता है। वैसे भी पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी को रमन सरकार के वक्त यह बंगला आवंटित हुआ था। बंगले के बगल में ही बजट से बाहर जाकर पूर्व विधायक अमित जोगी के लिए भी निर्माण करके दिया गया।

अब श्रीमती रेणु जोगी ही परिवार में एकमात्र विधायक बची हैं। सरकारी बंगले से जेसीसीजे की बैठक से लेकर प्रेस वार्ता तक हो रही है। ऐसे में जाति, मरवाही परिणाम और आगे की सियासत भी बंगले का भविष्य तय करेगी।

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