छत्तीसगढ़शहर

45 वर्षों से अटकी बोधघाट परियोजना को मिला नया मोड़

वेपकोस का सर्वे तय करेगा भविष्य, 49 हजार करोड़ की योजना से बदलेगी बस्तर की तस्वीर
तीन माह में सर्वे पूरा होने की उम्मीद, सरकार परियोजना को निर्णायक चरण तक ले जाने के मूड में
सिंचाई, बिजली और रोजगार की उम्मीदों के बीच विस्थापन व जनसहमति सबसे बड़ी चुनौती

अनिल सामंत

जगदलपुर/नवप्रदेश। (The Bodhghat project) दंतेवाड़ा जिले के बारसुर के समीप इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। करीब 45 वर्षों से फाइलों, विरोध और विस्थापन की आशंकाओं के बीच अटकी यह परियोजना अब नए सर्वे के साथ निर्णायक दिशा की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा परियोजना को पुनर्जीवित करने के फैसले के बाद दिल्ली की वेपकोस लिमिटेड ने क्षेत्र में सर्वे कार्य शुरू कर दिया है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार आगामी तीन महीनों में सर्वे पूरा कर लिया जाएगा, जिसके आधार पर नई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार होगी।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं इस परियोजना की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। सरकार इस बार बोधघाट परियोजना को केवल घोषणा तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे धरातल पर उतारने की तैयारी में है। 1979 में मध्य प्रदेश शासन के समय केंद्र सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी। उस समय इसका उद्देश्य 500 मेगावाट बिजली उत्पादन था, लेकिन अब इसका स्वरूप बदलकर बहुउद्देशीय कर दिया गया है। वर्तमान अनुमान के अनुसार इसकी लागत 49 हजार करोड़ रुपए से अधिक पहुंच चुकी है।

दंतेवाडा, बीजापुर और सुकमा जिले के 269 गांव में बढ़ेगी सिंचाई व्यवस्था
परियोजना पूरी होने पर दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिले के 269 गांवों के किसानों को सालभर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो सकेगा। अकेले दंतेवाड़ा जिले के 100 से अधिक गांव इस सिंचाई नेटवर्क से सीधे जुड़ेंगे। जल संसाधन विभाग के अनुसार बस्तर संभाग में कुल नौ बड़ी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं और बोधघाट के आगे बढऩे के बाद मटनार, चित्रकोट, कुटरू, नुगूर तथा भोपालपटनम जैसी अन्य जलविद्युत एवं बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लिए भी रास्ता खुल सकता है।

कांग्रेस शासन में भूपेश ने परियोजना सर्वे की दी थी स्वीकृति
हालांकि परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज भी विस्थापन और जनसहमति की है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने कार्यकाल में इस परियोजना के सर्वे और डीपीआर के लिए सैद्धांतिक सहमति देते हुए 50 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी थी। उस दौरान उन्होंने नक्सलियों और विरोध करने वाले संगठनों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि आदिवासियों के खेतों तक पानी और रोजगार पहुंचना चाहिए। लेकिन बाद में चुनावी दौर में उनका रुख बदला और उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जब तक बस्तर के लोग सहमत नहीं होंगे, तब तक बोधघाट परियोजना शुरू नहीं की जाएगी।

कांग्रेस की नजर टिकी
अब जबकि भाजपा सरकार इस परियोजना को फिर गति देने की कोशिश कर रही है। नजरें कांग्रेस के रुख पर भी टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि विकास, सिंचाई और रोजगार के दावों के बीच बस्तर की जनता इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कितना स्वीकार करती है।

बोधघाट परियोजना से बदल सकती है बस्तर की तस्वीर
प्रस्तावित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना को बस्तर की नई लाइफ लाइन मानी जा रही है। इंद्रावती नदी पर बनने वाली इस योजना से हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद है। परियोजना के जरिए बिजली उत्पादन, कृषि विस्तार, रोजगार सृजन और जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। दूसरी ओर हजारों लोगों के संभावित विस्थापन, जंगल और पर्यावरण पर असर तथा आदिवासी गांवों के अस्तित्व को लेकर चिंता भी बनी हुई है। यही वजह है कि 45 वर्षों बाद भी यह परियोजना विकास और विरोध के बीच झूलती रही है। अब नया सर्वे और डीपीआर यह तय करेगा कि बोधघाट परियोजना वास्तव में बस्तर के विकास का आधार बनेगी या फिर एक बार फिर विवादों में उलझ जाएगी।

एक समय शुरू हुई पोलावरम और बोधघाट परियोजना
बताया जा रहा है कि पोलावरम परियोजना और बोधघाट परियोजना लगभग एक ही समय में शुरू हुई थीं, लेकिन पोलावरम का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, जबकि बोधघाट परियोजना अब तक प्रारंभ नहीं हो सकी। परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास एवं आजीविका के लिए पशुपालन, मत्स्य पालन, पर्यटन और परिवहन जैसे वैकल्पिक रोजगार की योजना भी तैयार की जा रही है।

वर्जन
सर्वे और डीपीआर की जिम्मेदारी वाप्कोस लिमिटेड को
जगदलपुर। प्रस्तावित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना के सर्वेक्षण, अनुसंधान एवं विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार करने की जिम्मेदारी भारत सरकार के मिनीरत्न उपक्रम वाप्कोस लिमिटेड को सौंपी गई है। कंपनी केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त करने की प्रक्रिया भी पूरी करेगी। – ग्राहम, सीई, जल संसाधन विभाग

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