OBC Identity : विशुद्ध राजनीति है ओबीसी वोट बैंक बिल

OBC Identity : विशुद्ध राजनीति है ओबीसी वोट बैंक बिल

OBC Identity: OBC vote bank bill is pure politics

OBC Identity

OBC Identity : राज्यों को ओबीसी की पहचान कर सूची बनाने का अधिकार देने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने वोट बैंक को लुभाने के लिए आरक्षण की पैरोकारी में एक दूसरे को पछाडऩे का जमकर दांव चला। देखा जाए तो बात या दुहाई चाहे किसी की दी जाए लेकिन ओबीसी आरक्षण संविधान (127वां संशोधन) बिल को संसद में पारित करना विशुद्ध चुनावी राजनीति है, लिहाजा विपक्ष ने मोदी सरकार के साथ एकजुट होकर संसद में चर्चा और बिल को पारित कराने को सहमति दी है।

यह विपक्ष की राजनीतिक मजबूरी भी है, क्योंकि ओबीसी वोट बैंक को नाराज कर राजनीति करना असंभव है। यदि यह बिल पारित होकर कानून बनता है, तो राज्य सरकारों को अतिरिक्त शक्तियां मिल सकेंगी कि वे परिस्थितियों और ओबीसी की संख्या के आधार पर जातियों को आरक्षण की सूची में डाल सकेंगी। ओबीसी सूची में लगातार संशोधन कर सकेंगी। खैर, लंबे समय से ओबीसी बिल को लाने की मांग की जा रही थी. एनडीए की पूर्व सहयोगी शिवसेना के प्रमुख और महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने भी राज्य में मराठा आरक्षण के बाबत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर इस बिल को लाने की मांग की थी।

दरअसल, महाराष्ट्र सरकार के मराठा आरक्षण के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ओबीसी (OBC Identity) लिस्ट तैयार करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है. अन्य राज्य की सरकारों द्वारा भी ओबीसी सूची तैयार करने का अधिकार दिए जाने की मांग समय-समय पर उठाई जाती रही है। इस ओबीसी बिल के सहारे राज्यों में कई जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में जोडऩे का रास्ता खुल गया है. आइए जानते हैं कि ओबीसी बिल का देश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इस बिल को पारित कराने के लिए संसद के संग्राम को विराम देने वाली कांग्रेस ने विधेयक का समर्थन करते हुए दो कदम आगे बढ़कर आरक्षण की मौजूदा 50 फीसद की अधिकतम सीमा को बढ़ाए जाने की पैरोकारी की। तो जदयू, सपा, बसपा से लेकर द्रमुक जैसे दलों ने भी अपनी राजनीति को साधते हुए पूरे देश में जातीय जनगणना कराए जाने की मांग उठाई। पेगासस पर तीन हफ्ते से जारी घमासान के बीच तमाम पार्टियों ने चाहे अपनी सियासी वोट बैंक को साधने के लिए भरपूर दांव लगाया मगर इस विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की एकजुटता भी बेमिसाल रही।

लोकसभा में ओबीसी सूची से संबंधित इस विधेयक पर चर्चा की शुरूआत करते हुए कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चैधरी ने पहले तो पेगासस जासूसी कांड के मुद्दे को उठाया। इसके बाद बिल का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार की चूक से राज्यों का (OBC Identity) ओबीसी सूची का अधिकार छिन गया था और इस विधेयक के जरिए सरकार अपनी गलती को सुधार रही है। अब समय आ गया है कि सरकार आरक्षण की मौजूदा अधिकतम 50 फीसद की सीमा की समीक्षा कर इसे बढ़ाने के रास्ते पर विचार करे। अधीर रंजन ने कहा कि सरकार को इस पर गौर करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी फैसले की कानूनी बंदिश की बाधा विधायी रूप से कैसे दूर की जा सकती है।

संसद का यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के समानांतर होगा, क्योंकि मराठा आरक्षण के केस में सुप्रीम अदालत का फैसला था कि राज्य सरकारों को ऐसे आरक्षण और सूची में ओबीसी को शामिल करने का अधिकार ही नहीं है। यह विधेयक राजनीतिक सोच के मद्देनजर इसलिए है, क्योंकि अन्य पिछड़ा वर्ग सबसे बड़ा और व्यापक समुदाय है। सबसे ताकतवर वोट बैंक है, लेकिन उसका सियासी जुड़ाव विभाजित है। ओबीसी वोट बैंक अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रति प्रतिबद्ध है।

मसलन-सपा और राजद के पक्ष में अधिकतर यादव समुदाय है। दक्षिण भारत में भी ओबीसी बहुतायत में हैं, लिहाजा वहां कई संदर्भों में आरक्षण 50 फीसदी से अधिक है। चूंकि 2022 की शुरुआत में ही उप्र में विधानसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा गैर-यादव ओबीसी (OBC Identity) वोट बैंक पर भाजपा की भी निगाहें टिकी हैं। इधर ओबीसी और कुछ दलित जातियों ने भाजपा के पक्ष में वोट देकर पार्टी का जनाधार बढ़ाया है। उप्र में ही 39 जातियों और उपजातियों को ओबीसी सूची में शामिल करने की भी चर्चा है। यदि संसद में ओबीसी संविधान संशोधन बिल पारित हो जाता है, तो न केवल उप्र में भाजपा की मंशा फलीभूत होगी, बल्कि हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर, महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल और कर्नाटक में लिंगायत समुदायों को भी ओबीसी सूची में शामिल करना आसान होगा।

ये सभी भाजपा-केंद्रित अथवा भाजपा शासित राज्य हैं, लेकिन छत्तीसगढ़, मप्र, झारखंड, नागालैंड और मिजोरम आदि राज्यों में आदिवासियों की संख्या अधिक है। कई राज्यों में अति पिछड़ा वर्ग भी हैं। नई ओबीसी के मद्देनजर क्या जनजातियों और अति पिछड़ा वर्ग की अनदेखी होगी या उनके आरक्षण में नए हिस्सेदार भी शामिल किए जाएंगे? इस दौरान यह मांग भी जोर पकडऩे लगी है कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी जो सर्वोच्च अदालत ने तय कर रखी है, संसद ओबीसी बिल के जरिए उसे भी बढ़ाए। क्या संसद यह अतिक्रमण भी करेगी?
बहरहाल आरक्षण के नए सामाजिक-आर्थिक वर्ग तैयार किए जा रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों की दृष्टि उनके वोट की सामूहिक ताकत पर है।

ओबीसी (OBC Identity) को लेकर मोदी सरकार का यह दूसरा महत्त्वपूर्ण फैसला है। इससे पहले सरकार ने मेडिकल के केंद्रीय कोटे में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की थी। वर्ष 2018 में संविधान के 102वें संशोधन के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया था, लेकिन उसके तहत राज्यों में ओबीसी की पहचान करना और उन्हें सूची में डालने का संवैधानिक अधिकार नहीं मिला था, लिहाजा सरकार 127वां संशोधन बिल ला रही है।

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