संस्मरण शहादत के : 21 मई 91 की रात और 25 मई 13 का दिन

यशवंत धोटे
रोजमर्रा की तरह कलेक्ट्रेड की बीट से लौटकर प्रेस में तीन चार खबरें हाथ से लिखी और कंप्यूटर रूम में आपरेटर सनत कुमार क्षत्री (अब नहीं है) और दिवाकर सिंह (अभी है) को यह कहकर दी कि, चलाकर रखों मैं आकर पढ़ता हूं। खबर चली, पढ़ी, बटरशीट का प्रिन्ट निकला (उस समय ए-4 साइज के छोटे प्रिन्ट निकला करते थे)। और उसे लेकर पहुंचा पेस्टिंग टेबल पर मौजूद पेस्टर दुकाल निषाद (अब नहीं है) के पास। अशोक श्रीवास्तव (अभी है) अपना पेज तिवारी पेस्टर से लगवा ही रहे थे और वे चाह रहे थे कि हम अपना काम खत्म कर उन्हें कुम्हारी जाने के लिए बस स्टेड छोड़ा जाय। मैंने भी वही किया। निषाद से अपना पेज लगवाया और भैय्या को छोडने प्रेस से मिली बजाज कब स्कूटर से बस स्टैंड पहुंच गया। हालंाकि 21 जून 1989 को औपचारिक रूप से शुरू हुए इस 8 पेज के आफसेट अखबार के संपादक अविभाजित मध्य प्रदेश की पत्रकारिता के भीष्म पितामह राजनारायण मिश्र थे (अब नहीं है) और स्वास्थगत कारणों से प्रेस नहीं आ रहे थे और मैं उस अखबार का अघोषित वन मैन आर्मी कर्ता-धर्ता था। 21 मई 91 का यह संंस्मरण 21 मई 26 को ही लिखा जा सकता था। लेकिन 21 साल बाद 25 मई 2013 को उसी तासीर की बड़ी घटना भारत के नक्शे पर उभरे नवप्रदेश छत्तीसगढ़ के बस्तर में हुई और हमारी पत्रकारिता ने उसे जिया हो तो दोनों घटनाओं को जोड़कर लिखा जाना चाहिए था… सो लिख दिया।
21 मई 91 की रात 8 से 9 के बीच काम खत्म कर अशोक भैय्या को बस स्टैंड छोड़ा, तो वहा उनके पत्रकार मित्र डोमार सिंह चन्द्राकर (अब नहीं है) मिले और उनने मुझसे कहा धोटे तुम घर जाओं, अशोक को मंै छोड़ दूंगा। दिनभर की हरारत के बाद मैं अपने केलाबाड़ी (दुर्ग) के साहू बाड़ा वाले खपरेल के 65 रुपए महीने के किराए के कमरे पर पहुंचा। पंप वाले स्टोव पर खिचड़ी रखी और मुकेश कुमार के गाने वाला कैसेट (आ जा सनम मधुर चांदनी में हम) खोज रहा था। उस समय खान, पान के भले ही लाले रहे हो लेकिन गाने, बजाने के शौक ले देकर पूरे हो ही जाते थे। कुछ ही देर में खिचड़ी पकी, ठंडी हुई, खाई और फिर एक बार मुकेश के इस केसेट को खोजने लगा तो पता चला कि टेप में ही कैसेट की रील फंस गई है। उसको निकाला और पेन से रील समेटने लगा, उतने में ही दरवाजा खटखटाने की आवाज आई और खोला तो सामने दिवाकर सिंह खड़े थे। मैने पूछा अब क्या हो गया, ऐसा मैंने इसलिये पूछा कि आमतौर पर रात- बेरात कभी भी प्रेस में किसी भी तरह के ब्रेक डाउन पर वन- मेन आर्मी के रूप में मैं ही सामने रहता था। लेकिन इस बार मसला गंभीर था। उस समय ब्रेकिंग न्यूज जैसी फर्जी सनसनी का चलन नहीं था।
हमारे यहा समाचार एजेंसी, भाषा, के प्रिन्टर पर आई, फ्लेश, फ्लेश, फ्लेश, तमिलनाडु में राजीव गांधी पर हमला, लिट्टे का हाथ ? कुछ इस तरह की तीन चार हेंिडग की प्रिन्टर की स्क्रीप्ट लेकर दिवाकर आए थे। और वैसे भी, फ्लेश, फ्लेश, फ्लेश, देखकर सब एडिटर या एडिटर समझ जाते थे कि मामला गंभीर है। दिवाकर ने कहा कि राजीव गांधी पर तमिलनाडु में हमला हो गया है। जल्दी प्रेस चलों। मैं तैयार हुआ और दिवाकर के साथ ही प्रेस पहुंचा और देखा तो प्रेस के सामने फिरोज खान (अभी है) समेत युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की भीड़ लगी हैं और सब जानना चाह रहे हैं कि असल खबर क्या हैं। कलेक्टर प्रल्हाद सिंह तोमर और मोहन नगर से मोतीलाल वोरा, कोलिहापुरी से चन्दूलाल चन्द्राकर और संतरा बाड़ी से वासुदेव चन्द्राकर के यहां से प्रेस के लेंडलाइन नंबर पर लगातार फोन आ रहे थे और यही पूछ रहे थे कि क्या डिटेल है बताओ। हमने फोन को होल्ड किया और भाषा, की पूरी खबर को चलाया, पहला पेज जो लग चुका था उसे केसिंल किया और नया पेज लगाया। जिसमें हेडिंग सिर्फ एक थी, बम विस्फोट में राजीव गांधी की मौत। हालांकि दूसरे दिन हमारी इस हेडिंग की आलोचना हुई। यहां यह बताना जरूरी है कि दुर्ग में दो पावर सेन्टर थे मोतीलाल वोरा और चन्दूलाल चन्द्राकर और दोनों ही पत्रकारिता के चरम से राष्ट्रीय राजनीति में गए और राजीव गांधी के करीब रहे। उसी दुर्ग से हमारी पत्रकारिता की 1986 में बुनियाद पड़ी।
शहादत के दूसरे संस्मरण में 25 मई 2013 को 3 से 4 बजे के बीच वार्ता के प्रिन्टर के पास गया तो वहा भी, फ्लेश, फ्लेश, फ्लेश, चल रहा था। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमला, दो के मरने की खबर फिर चार के मरने की खबर और ये खबर देखते-देखते और उसे अपडेट करते-करते पता चला की कांग्रेस पूरी फ्रंटलाइन लीडरशीप इस हमले में मारी जा चुकी थी। दो घन्टे के अन्दर राष्ट्रीय और अन्र्तराष्ट्रीय मीडिया में भारत के नवप्रदेश छत्तीसगढ़ का नक्शा पूरी दुनिया को ठीक वैसे ही दिखाया जाने लगा जैसे 21 मई 91 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर का दिखाया गया था जहा राजीव गांधी की हत्या हुई थी। फर्क ये था कि राजीव गांधी को तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे ने मारा था। बस्तर में नक्सलियों ने कहर बरपाया था। इस हमले में कांग्रेस के कद्दावर नेता विद्याचरण शुक्ल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, बस्तर टाईगर के नाम से चर्चित महेन्द्र कर्मा समेत 29 लोग मारे गए थे।
तीनों बड़े नेता 2013 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। वैसे तो बस्तर में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की मास कीलींग के सारे रिकार्ड ताड़मेटला कांड में 76 जवानों की हत्या कर तोड़ ही दिए थे। लेकिन किसी राजनीतिक दल की चुनावी यात्रा पर पूरे देश में पहला बड़ा नक्सली हमला था और वो भी तब जब केन्द्र में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार थी। यहां यह बताना लाजिमी है कि मैंन अपना अखबार दैनिक नवप्रदेश 7 फरवरी 2012 को शुरू किया था। तब से बस्तर को लेकर खूब लिखा.. पढ़ा और आज 13 साल बाद केन्द्र की सरकार ने बस्तर को नक्सलमुक्त घोषित कर बस्तर में बदलाव के रास्ते खोले है। आज नवप्रदेश समाचार पत्र समूह बस्तर में शहीद हुए सैकड़ों जवानों, भाजपा और कांग्रेस के शहीद नेताओं के और नक्सल हमले में मारे आदिवासी परिवारों के परिजनों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। जय छत्तीसगढ़…।



