विशेष आलेखसंपादकीय

खबरों की मरम्मत: …और जीता टेलेन्ट, सरकार बेचेगी रेत लेकिन…बड़ा चिरकुट कौन ?

टाट में पैबन्द

पिछले सवा दो साल में हर तीसरे महीने मुख्यमंत्री बदलने की अफवाह उड़ाने वाले गिरोह की पतासाजी में लगी केन्द्र व राज्य की जांच एजेंसियों को अपने ही ‘टाट में पैबन्द’ दिखने लगे तो फिर क्या ही कहे? इस सवा दो साल में कम से कम तीन चार बार ऐसा हुआ है। हर अफवाह के बाद केन्द्र और राज्य की खुफिया एजेंसियां अपने स्तर पर पतासाजी करने लगती है, लेकिन घूम फिर बात वही आ जाती हैं कि ‘हमे तो अपनों ने मारा गैरो में कहा दम था… कश्ती, वहा डूबी जहा पानी कम था’ दरअसल एक तबका आदिवासी मुख्यमंत्री को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हैं तो वह केन्द्र शासित प्रदेश होने का उलाहना देता है। साथ में सरकार पर नौकरशाही के प्रकोप का रोना रोता है। अब यदि सीधे तौर पर सरकार बदनाम नहीं हो पा रही तो कुछ इस तरह की कलाबाजियां करता है कि सरकार भी बदनाम हो जाए और स्वार्थ भी सध जाय। नीति नियन्ताओं की मासूमियत देखिए कि अफवाहबाजों की तलाश विपक्षी खेमे में की जा रही है, जबकि सब जान रहे हैं कि सारे स्वनामधन्य, सर्वदलीय बड़े नेताओं के राजनीतिक, आर्थिक हित सत्ता से जुड़े हैं ।

आखिर कर ही दिया कमाल

पिछले सप्ताह इसी कालम में हमने दर्जा प्राप्त नेताओं की पीड़ा व्यक्त की थी, उन्हें दर्जा तो केबिनेट और राज्य मंत्री का है, लेकिन वित्तीय अधिकार नहीं होने के कारण काम धंधा मंदा था। लेकिन खेल शुरू हो चुका हैं , महिला बाल विकास विभाग से। राज्यभर की 1 लाख 94 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए साड़ी खरीदी का आदेश खादी ग्रामोद्योग को दिया गया था। लगभग 9 करोड़ 70 लाख रुपए की इस खरीदी में 100 रुपए की साड़ी 500 रुपए में प्रदाय करने के आरोप हैं , यानि विशेषज्ञ यह गणित लगा रहे हैं कि इस खरीदी में खेल कितने करोड़ का हुआ है। दरअसल ये अभी शुरुआत है, क्योंकि खादी ग्रामोद्योग को भंडार क्रय नियमों में छूट होने के कारण विभागों को सीधे सप्लाई कर सकते हैं। यानि जेम के नियम शर्तों से बाहर। सोशल मीडिया में फजीहत के बाद विभाग ने जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन जब खुद की जांच खुद को ही करनी हो तो जांच रिपोर्ट का अंदाजा लगा लीजिए।

बड़ा चिरकुट कौन ?

इन दिनों चिरकुटाई को लेकर देशव्यापी बहस चल रही है कि कौन कितना बड़ा चिरकुट है? इरान अमरीका और इजराईल युद्ध के दरम्यान मेन स्ट्रीम टीवी मीडिया के सभी चैनलों महिला, पुरूष एंकरों को एक पाकिस्तानी बलूच चिरकुट बेइन्तहा जलील कर रहा है। नान स्टाप, गाली- गलौच, अश्लील टिप्पणी के बावजूद कोई भी एंकर उसको रोकता नहीं, अलबत्ता उसके हौसले इतने बुलन्द है कि 140 करोड़ की आबादी वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का नाम लेकर बेहूदे ढंग से बात करता है। फिर भी न केवल उसे पाकिस्तान से चैनल पर आन एअर लिया जाता हैं , बल्कि उसकी नान स्टाप गाली को सुना और सुनाया जा रहा है। इसे टीआरपी की भूख समझने वाले लोग इस पाखंड को नहीं समझ पा रहे हैं। मेन स्ट्रीम के लोग तो देश की संप्रभुता के साथ खेल ही रहे है कुछ यू ट्यूबरों ने इसको धंधा बना लिया हैं इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। इसके पीछे किसका इको सिस्टम काम कर रहा हैं यह शोध का विषय है। चिरकुटाई में एक-दूसरे को मात देते इन लोगों की हल्कट दर्जे की चिरकुटाई का विरोध तो होना चाहिए। नहीं तो गंदगी उपर से नीचे की ओर तो बहती ही है।

…और जीता टेलेन्ट

पिछले सप्ताह इसी कॉलम में पाठकों के हवाले से एक सवाल छोड़ा गया था कि नोट शीट से मचे हड़कंप के बाद देखे कौन जीतता है। सत्ता संगठन का इकबाल या अफसर का टेंलेंट? ‘इसका जवाब इस हप्ते मिल गया और …जीता टेंलेंट’। प्रशासन में डिजिटल नवाचारों के ध्वजावाहक कहे जाने वाले शैलाभ साहू सारें झांझावतों को पार करते हुए आखिर अपनी मंजिल पर पहुंच ही गए। वन व परिवहन मंत्री केदार कश्यप के ओएसडी बनने के लिए चली उनकी नोटशीट ने ऐसा हड़कम्प मचाया कि दिल्ली से लेकर बंगाल तक न केवल सत्ता, संगठन बल्कि डिजिटल गलियारा भी चौक गया। विचारधारागत सारी शिकवा शिकायतों के बावजूद अपने टेलेन्ट के बूते लक्ष्य पर पंहुचे इस डिजिटल प्रेमी अफसर को परम्परागत प्रशासन की कसौटी पर खरा उतरना हैं, हालांकि उन्हें पोलिटिकल मैनेजमेंट के लिए भी जाना जाता है, बशर्ते कि वह सरकार के हित में हो।

सरकार बेचेगी रेत लेकिन…

सरकार ने रेत बेचने का फैसला कर लिया है। सरकार अब रेत ठेकेदारों की मोनोपली खत्म करने खनिज विकास निगम के माध्यम से रेत बेचेगी। दावा किया जा रहा है कि आम जनता को राहत मिलेगी। लेकिन, सरकार ने जिस तर्ज पर रेत बेचने का फैसला किया है, उससे माइनिंग अफसरों के इरादे जाहिर हो गए हैं। दरअसल, सरकार ने उचित मूल्य की दुकानों की तर्ज पर रेत बेचने का फैसला किया है। माइनिंग विभाग के मासूम अफसरों को शायद यह पता नहीं है कि शासकीय उचित मूल्य की दुकानें पिछले कई दशकों से ब्लैक मार्केटिंग के लिए सिर्फ प्रदेश में नहीं बल्कि पूरे देश में कुख्यात हैं। अब राशन दुकानों की तर्ज पर जब रेत बिकेगी तो कालाबाजारी तो होगी ही। रेत की कालाबाजारी का कुछ हिस्सा रेत ठेकेदारों के हाथ से छीनकर खनिज विकास निगम के माध्यम से ब्लैक मार्केटिंग शुरू हो जाएगी।

‘बीबी’ के बिना नहीं दिख रहा कांग्रेस का दमखम

बीते एक हफ्ते में प्रदेश में दो बड़े मामले सुर्खियों में रहे। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को घटिया साडिय़ों के वितरण का मामला उजागर हुआ और इसके बाद सक्ती में वेदांता पॉलर प्लांट का बायलर फूटने से 21 लोगों की मौत का दर्दनाक हादसा हुआ। दोनों ही मामलों में कांग्रेस का स्टैंड दमदार नहीं रहा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पिछली सरकार के कद्दावर नेता चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव, जैसे दिग्गज नेताओं की सक्रियता सिर्फ इक्का दुक्का बयानबाजी तक सीमित है। वेदांता हादसे की जांच टीम के गठन से भी मामला गर्म नहीं हो सका। ताम्रध्वज साहू, रविंद्र चौबे, मोहम्मद अकबर जैसे कई बड़े नेता तो पूरी तरह सीन से गायब हैं। कांग्रेस नेता की यदि माने तो ‘बीबी’ के बिना कांग्रेस पॉवरफुल तरीके से दमखम नहीं दिखा पाती। ‘बीबी’ इस समय बंगाल के चुनाव में व्यस्त हैं। गृह राज्य में कुछ घंटे के लिए आकर लौट जाते हैं। इसलिए माहौल नहीं बन पा रहा। कांग्रेस नेताओं को ‘बीबी’ यानी भूपेश बघेल के लौटने का इंतजार है, ताकि सूरज की तपिश के साथ ही यहां की राजनीति का पारा भी चढ़ सके।

शराबबंदी की मांग और बहन जी की पलटीमार राजनीति

कांग्रेस की शराबबंदी की मांग से एक बार फिर राजनीति गरमा गई है। जब तक कांग्रेस सरकार रही तब तक शराबबंदी की मांग को लेकर कांग्रेस नेताओं का गोलमोल जवाब रहा। शराबबंदी से होने वाले सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नफे नुकसान की रायशुमारी में सारा कार्यकाल निकाल दिया। इस दौरान भाजपा गंगाजल लेकर शराबबंदी की कसम की याद दिलाती रही। यहां तक की भाजपा की राष्ट्रीय स्तर की पदाधिकारी भी तब के सीएम को राखी भेजकर शराबबंदी का उपहार मांगती रही। अब सरकार बदलने के बाद अब पूरा सीन उलट पलट चुका है। अब कांग्रेसी शराबबंदी की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस-भाजपा के शह और मात के इस खेल में शराब की बिक्री दिन दुनी और रात चौगुणी बढ़ रही है। भाजपा वाली बहनजी ने तो चुप्पी साध ली है। अब कांग्रेस शराबबंदी मांग रही है।

स्कूलों में टायलेट तो है नहीं, पढ़ाई मंत्रोच्चार से

प्रदेश के 5 हजार से ज्यादा स्कूलों में टायलेट नहीं है। सर्वे रिपोर्ट पर यदि भरोसा करे तो ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों की बच्चियां सिर्फ टायलेट की वजह से स्कूल जाना छोड़ रही है। इस ड्रापऑउट पर विभाग कितना चितिंत है कि ओ इस बात से पता चलता है कि स्कूलों में पढ़ाई की शुरुआत मंत्रोच्चार से करने के आदेश देता है, लेकिन पढ़ाई के लिए बुनियादी जरूरतों को दरकिनार किया जा रहा है। यानि स्कूल जाकर मंत्र पढि़ए और यदि टायलेट का प्रेशर बने तो बाहर जाकर किसी सुरक्षित जगह पर रिलिज करें।

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