Bastar Model Success : बस्तर मॉडल बना मिसाल, 8241 परिवारों को मिला जमीन पर वैध हक

बस्तर जिले में चलाया गया विशेष फौती नामांतरण अभियान सुशासन और जनसेवा का एक प्रभावी उदाहरण बनकर उभरा है। प्रशासन की सक्रिय पहल से 8,241 परिवारों को उनकी जमीन पर वैध अधिकार मिल गया है। वर्षों से लंबित पड़े मामलों का निराकरण कर अब जमीन के सरकारी रिकॉर्ड में मृतक भू-स्वामियों के स्थान पर उनके वास्तविक वारिसों के नाम दर्ज किए जा चुके हैं। इससे हजारों परिवारों को जमीन संबंधी विवादों, बैंकिंग प्रक्रियाओं और शासकीय योजनाओं के लाभ लेने में होने वाली परेशानियों से राहत मिलेगी।
दरअसल, बस्तर जिले के अनेक गांवों में ऐसी स्थिति थी, जहां परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद भी राजस्व अभिलेखों में उनका ही नाम दर्ज था। इसके कारण वारिसों को जमीन से जुड़े कार्यों, ऋण लेने, नामांतरण, मुआवजा प्राप्त करने और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। समस्या की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने विशेष अभियान चलाकर चार वर्षों से लंबित फौती नामांतरण प्रकरणों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का निर्णय लिया।
611 गांवों में घर-घर पहुंचा प्रशासन
अभियान के तहत जिले के 611 गांवों में ग्राम सचिव, पटवारी और कोटवार की संयुक्त टीमों ने घर-घर जाकर जानकारी जुटाई। ग्राम सचिवों द्वारा पिछले चार वर्षों में हुई मौतों का विवरण संकलित किया गया। इसके बाद पटवारियों ने राजस्व रिकॉर्ड का मिलान कर ऐसे मामलों की पहचान की, जिनमें फौती नामांतरण आवश्यक था।
जांच के दौरान कुल 17,405 मृत व्यक्तियों की जानकारी सामने आई, जिनमें से 8,651 मामलों में फौती नामांतरण की आवश्यकता पाई गई। जिन परिवारों के पास मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं थे, उनके प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया भी प्रशासन ने स्वयं पूरी कराई। साथ ही वारिसों की जानकारी जुटाकर वंशवृक्ष तैयार किए गए और सभी आवश्यक दस्तावेजों की पूर्ति के बाद नामांतरण की कार्रवाई की गई।
8241 मामलों का निराकरण, केवल 410 शेष
विशेष अभियान के परिणामस्वरूप अब तक 8,241 फौती नामांतरण प्रकरणों का सफलतापूर्वक निराकरण किया जा चुका है। केवल 410 मामले शेष हैं, जिन पर कार्रवाई जारी है। इससे हजारों परिवारों की जमीन के रिकॉर्ड अद्यतन हो गए हैं और भविष्य में होने वाले कानूनी एवं प्रशासनिक विवादों की संभावना भी कम हुई है।
सुदूर आदिवासी इलाकों में भी मिला लाभ
अभियान का दायरा केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तोकापाल, करपावंड, बस्तर, बास्तानार, बकावंड, भानपुरी, नानगुर, जगदलपुर, लोहंडीगुड़ा और दरभा जैसे सुदूर आदिवासी एवं पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचा। प्रशासनिक टीमों ने ग्रामीणों को दफ्तरों के चक्कर लगाने से बचाते हुए गांवों में ही प्रक्रिया पूरी की।
तहसीलवार आंकड़ों पर नजर डालें तो तोकापाल में 1,454, करपावंड में 504, बस्तर में 1,019, बास्तानार में 337, बकावंड में 1,142, भानपुरी में 959, नानगुर में 518, जगदलपुर में 1,057, लोहंडीगुड़ा में 799 तथा दरभा में 452 मामलों का निराकरण किया गया।
मुख्यमंत्री बोले- अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे लाभ
मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। बस्तर में चलाया गया विशेष फौती नामांतरण अभियान इसी सोच का परिणाम है। उन्होंने कहा कि वारिसों को समय पर अधिकार दिलाना सरकार की प्राथमिकता है, जिससे भविष्य में उन्हें किसी प्रकार की प्रशासनिक परेशानी का सामना न करना पड़े।
बढ़ेगा भरोसा, घटेंगे जमीन विवाद
जिला प्रशासन के अनुसार अभियान के बाद हजारों परिवारों के जमीन संबंधी रिकॉर्ड सही हो गए हैं। इससे लोगों को बैंक ऋण, भूमि हस्तांतरण, मुआवजा, शिक्षा और अन्य शासकीय योजनाओं का लाभ लेने में आसानी होगी। साथ ही जमीन संबंधी विवादों में कमी आएगी और प्रशासन के प्रति लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा। यही वजह है कि बस्तर का यह मॉडल अब सुशासन और जनकेंद्रित प्रशासन के सफल उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।



