संपादकीय: जुबानी जंग पर भी लगे विराम

Editorial: अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के संघर्ष विराम की अवधि खत्म होने के चंद घंटे पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस संघर्ष विराम को और आगे बढ़ा दिया है। उनका कहना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता नहीं हो जाती और दोनों देश किसी समझौते पर नहीं पहुंच जाते तक तब संघर्ष विराम जारी रहेगा। उन्होंने कहा है कि अमेरिका संघर्ष विराम के चलते तक ईरान पर कोई हमला नहीं करेगा लेकिन होर्मूज स्ट्रेट की नाकाबंदी जारी रखेगा और अमेरिकी सैनिकों को भी वहां किसी भी परिस्थति से निपटने के लिए तैयार रखेगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्ष विराम की अवधि बढ़ाने का क्रेडिट भी अपने पिट्ठू पाकिस्तान को दिया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और असीम मुनीर के अनुरोध पर उन्होंने संघर्ष विराम को आगे बढ़ाया है ताकि दोनों देशों के बीच समझौते की गुंजाइश बनी रहे। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने शांति वार्ता के दूसरे दौर की तैयारी कर रखी थी लेकिन ईरान ने दूसरे दौर की बातचीत से साफ इंकार कर दिया। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका होर्मूूज की नाकेबंदी खत्म नहीं करता तब तक वह शांति वार्ता नहीं करेगा।
ईरान ने तो अमेरिका को यह भी चेतावनी दी है कि ईरान अमेरिका के प्रस्तावों को हरगीज नहीं मानेगा। भले ही दोनों के बीच जंग होती है तो हो जाये ईरान कई सालों तक जंग लडऩे के लिए तैयार बैठा है। इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने फिर ईरान को धमकी दी है कि ईरान बातचीत की टेबल पर आ जाये और अमेरिका के प्रस्ताव को मंजूर कर ले अन्यथा इस बार अमेरिका ईरान को नेस्तनाबूत करके रख देगा। एक ओर तो डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर एकतरफा संघर्ष विराम की अवधि बढ़ा दी है वहीं दूसरी ओर वे ईरान को धमकी चमकी देने से बाज नहीं आ रहे हैं।
संघर्ष विराम के बीच अमेरिका और ईरान के बीच चल रही यह जुबानी जंग हैरत की बात है। जब संघर्ष विराम को आगे बढ़ाया गया है तो दोनों देशों को एक दूसरे को इस तरह की धमकी नहीं देना चाहिए वरना शांति वार्ता होने की संभावना खत्म हो जाएगी। नतीजतन एक बार फिर जंग छिड़ेगी और यह न सिर्फ ईरान और अमेरिका के लिए घातक होगी बल्कि इसका गंभीर दुष्परिणाम पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा।
बहरहाल अब जबकि संघर्ष विराम की अवधि फिर से बढ़ा दी गई है तो कम से कम डोनाल्ड ट्रंप को तो अपनी जुबान पर लगाम देकर रखना चाहिए। अन्यथा ईरान भी उन्हें उनकी ही भाषा में जवाब देगा और ऐसे में दोनों के बीच दूसरी शांति वार्ता होने की और दोनों देशों के बीच किसी समझौते पर पहुंचने की बची कुची संभावना भी खत्म हो जाएगा।



