संपादकीय: श्रीलंका के सांसद साधुवाद के पात्र
Sri Lankan MPs deserve praise
Editorial: जनभावनाओं का सम्मान करना जनप्रतिनिधियों का परम पूनित कत्व्र्य होता है। श्रीलंका के सांसद साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार द्वारा संसद में लाये गये पूर्व संासदों की पेंशन को बंद करने के प्रस्ताव का समथर्न किया। श्रीलंका के न्याय मंत्री ने यह प्रस्ताव पेश करते हुए कहा था कि श्रीलंका की संसद में सांसदों का आचरण देखकर जनता चाहती है कि पूर्व सांसदों का पेंशन बंद किया जाये। इसके बाद यह प्रस्ताव पारित हो गया। निश्चित रूप से श्रीलंका सरकार का यह निर्णय सराहनीय ही नहीं बल्कि अनुकरणीय पहल है।
भारत में सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस छिड़ गई है। यहां भी लोग चाहते हैं कि पूर्व सांसदो का पेंशन बंद किया जाये। यदि जनमत संग्रह कराया जाएगा तो अधिकांश लोग पूर्व सांसदों के पेशन को बंद करने के समर्थन में ही अपना मत देंगे। हालांकि भारत में सांसदों और विधायकों को पेंशन देना कानून समम्मत है किन्तु इसमें भी कई विशंगतियां हैं। कम से कम उन्हें तो दूर किया जाना चाहिए। सांसदों का वेतन और पेंशन तो तय है लेकिन अलग अलग राज्यों में विधायकों की पेंशन और वेतन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है।
सांसदों को तो पहले पच्चीस हजार रूपये मासिक पेंशन मिलती थी जिसे 24 मार्च 2025 को बढ़ाकर 31 हजार रूपये किया गया था। वहीं विधायकों की पेंशन 25 हजार से लेकर 50 हजार रूपये तक है। सांसदों और विधायकों की पेंशन की उनकी वरिष्ठता के आधार पर की जाती है। यदि कोई विधायक बाद में लोकसभा का सांसद बनता है और फिर राज्यसभा का भी सांसद बन जाता है तो उसे तीहरा पेंशन मिलता है।
इसी तरह चार पांच बार के विधायकों को भी अधिक पेंशन मिलती है। ऐसे कई जनप्रतिनिधि हैं जिन्हें प्रतिमाह 3-4 लाख रूपये तक की पेंशन मिल रही है। इस विरोधाभाष को तो समाप्त किया जाना चाहिए। देश में पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आम आदमी पार्टी की सरकार ने एक विधायक एक पेंशन का नियम लागू किया है। वहां के विधायक चाहे कितनी भी बार विधायक बन चुके हों पूर्व विधायक के रूप में उन्हें एक ही पेंशन दी जाती है। पंजाब सरकार के इस फैसले का अन्य राज्यों को भी अनुकरण करना चाहिए।
वर्तमान में पूर्व सांसदों और पूर्व विधायकों को पेंशन के रूप में हर माह करोड़ो का भुगतान किया जाता है साथ ही उन्हें अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती है जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सरकारी कर्मचारियों को तो 30 साल की सेवा के बाद नाममात्र के पेंशन की पात्रता मिलती है जबकि सांसद और विधायक पांच साल के बाद ही पेंशन के रूप में हजारों रूपये पाने के अधिकारी बन जाते हैं। इस बारे में सरकार को श्रीलंका की सरकार से सीख लेकर कारगर पहल करनी चाहिए।
