Biometric Attendance : बायोमीट्रिक हाजिरी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर…परामर्श न होने से व्यवस्था अवैध नहीं…

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सर्वोच्च न्यायालय ने बायोमीट्रिक उपस्थिति प्रणाली को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि केवल कर्मचारियों से पूर्व परामर्श न लेने के कारण यह व्यवस्था अवैध (Biometric Attendance) नहीं ठहराई जा सकती। अदालत ने कहा कि इस प्रणाली को लागू करने का उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाना है, जो अंततः सभी हितधारकों के लिए लाभकारी है।

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि ओडिशा के प्रधान महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) कार्यालय में एक जुलाई 2013 से बायोमीट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू की गई थी। कर्मचारियों की आपत्तियों के बावजूद अदालत ने इसे वैध माना और कहा कि केवल इस वजह से कि परामर्श नहीं किया गया, पूरी प्रणाली को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि सरकारी कार्यालयों में समयबद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी साधनों का उपयोग (Biometric Attendance) आवश्यक है। यह कदम न केवल कर्मचारियों की उपस्थिति को प्रमाणित करता है, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन को भी मजबूत करता है। अदालत ने कहा कि जब कोई नीति सार्वजनिक हित में बनाई गई हो, तो केवल प्रक्रिया में परामर्श की कमी को आधार बनाकर उसे रद्द नहीं किया जा सकता।

पीठ ने यह भी सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसे निर्णयों के दौरान संवाद की प्रक्रिया को और मजबूत बनाया जाए, ताकि कर्मचारियों की व्यावहारिक चिंताओं और प्रशासनिक दृष्टिकोण के बीच सामंजस्य स्थापित हो सके।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को सरकारी दफ्तरों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की दिशा में अहम कदम माना (Biometric Attendance) जा रहा है। यह फैसला न सिर्फ ओडिशा के मामले तक सीमित रहेगा, बल्कि देशभर के सरकारी कार्यालयों में तकनीकी सुधारों और डिजिटल उपस्थिति प्रणालियों के प्रति दृष्टिकोण को भी प्रभावित करेगा।