संपादकीय: फिर निशाने पर चुनाव आयोग

Editorial: बंगाल में भाजपा की जीत के बाद एक बार फिर चुनाव आयोग न सिर्फ टीएमसी के बल्कि सारे विपक्षी दलों के निशाने पर आ गया है। तमिलनाडु और केरल में हुए सत्ता परिवर्तन को लोकतंत्र की जीत बताया जा रहा है लेकिन बंगाल में बही बदलाव की बयार को लोकतंत्र की हत्या करार दिया जा रहा है। असम में भाजपा ने जीत की जो हैट्रिक लगाई है उस पर भी सवालिया निशान लगाया जा रहा है। इसे ही कहते हैं मीठा- मीठा गप – गप और कडवा – कड़वा थू – थू। जो राजनीतिक धुरंधर यह मुगालते पाले बैठे रहते हैं कि वे तो पैदा ही शासन करने के लिए हुए हैं और कोई प्रदेश या देश उनकी बपौती है वे चुनाव में अपनी पराजय को स्वीकार ही नहीं कर पाते। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया पर तो कभी ईवीएम पर और कभी चुनाव आयोग पर अपनी हार का ठीकरा फोड़कर अपनी खीज निकालते हैं।
वे अपने गिरेबान में झांकने की जहमत उठाना ही नहीं चाहते। बंगाल की निवृत्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अगर अपनी पराजय को नहीं पचा पा रही हैं तो इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है। वैसे भी वो बहुत बड़ी नौटंकीबाज़ हैं उन्हें अच्छे से पता है कि उनके पाप का घड़ा भर चुका था जिसे फूटना ही था। बंगाल को बांग्लादेश बनाने की उनकी मंशा बंगाल के बाशिंदे समझ गए थे और इस बार उनको निपटाने का मन बना चुके थे। जब सारा देश मानकर चल रहा था कि इस बार बंगाल से टीएमसी का बोरिया बिस्तर बंधना तय है तो यह बात खुद को राजनीति की सबसे शातिर खिलाड़ी समझने वाली ममता बनर्जी न समझी हो यह भी भला मानने की बात है।
ममता बनर्जी को अपनी करारी शिकस्त का बहुत पहले ही अहसास हो चुका था और उसी समय से वे एफआईआर को लेकर हल्ला मचाने लगी थी और चुनाव आयोग को गरियाने लगी थी ताकि अपनी हार के लिए वे चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहरा कर लोगों की सहानुभूति बगैर सके। यही वो कर रही हैं। अपनी शर्मनाक पराजय को अपनी जीत बताकर कर बेशर्मी की पराकाष्ठा पार कर रही हैं।
ऐसा वे एक सोची समझी रणनीति के तहत कर रही हैं। उन्हें पता है कि अब बंगाल में उनकी दुकानदारी नहीं चलने वाली क्योंकि बंगाल का इतिहास रहा है कि वहां के भद्रक जब एक बार किसी राजनीतिक पार्टी पर भरोसा जताते हैं उससे उनका मोहभंग जल्दी नही होता। वे कई बार उसे मौका देते हैं और जब वह उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती तो उसे न सिर्फ सत्ता से उखाड़ फेंकते हैं बल्कि फिर कभी पीछे मुड़कर उसकी तरफ नहीं देखते। बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी की दयनीय दशा इसका ज्वलंत प्रमाण है।
अंततोगत्वा टीएमसी का भी यही हश्र होना है यह ममता बनर्जी भली भाँति जानती है। इसलिए अब वे एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में आने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने की कवायद कर रही हैं। बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम को वे बड़ा मुद्दा बनाना चाहती हैं और चुनाव आयोग की सबसे बड़ी विरोधी नेता के रूप में अपनी छवि बनाकर आईएनडीआई की कमान अपने हाथों में लेकर खुद का कद बढ़ाना चाहती हैं जो अब घट चुका है। जिस इंडी गठबंधन की गांठे खुद ममता बनर्जी ने ढीली की हैं और एकला चलो रे की नीति पर चलते हुए बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी को दरकिनार कर के रखा था अब वे उसी गठबंधन को मजबूत करने की बात कर रही हैं।
अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, स्टालिन और अरविंद केजरीवाल जैसे हारे हुए जुआरियों को जमात उन्हें समर्थन दे सकती हैं क्योंकि ये सभी आईएनडीआई की अगुवाई करने वाली कांग्रेस से असंतुष्ट हैं। किंतु ये सभी यह भूल रहे हैं कि कांग्रेस संसद में सबसे बड़ी पार्टी है और चार राज्यों में उसकी सरकार है। इसलिए आईएनडीआई की अगुवाई करने की वह स्वाभाविक दावेदार है। बहरहाल देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की जनता द्वारा नकार दिए जाने के बाद ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति में कितना सफल होती हैं?



