जनप्रतिनिधि और अधिकारी: प्रतिद्वंद्वी नहीं, विकास के भागीदार


देवेंद्र किशोर गुप्ता
(Public representatives and officialsh) लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। यही विश्वास जनादेश बनकर जनप्रतिनिधियों तक पहुँचता है और नीतियों के रूप में प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से धरातल पर उतरता है। इसलिए लोकतंत्र में न जनप्रतिनिधि अकेले पूर्ण हैं और न प्रशासन। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि एक दिशा देता है तो दूसरा गति देता है। यदि एक जनता की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है तो दूसरा उन अपेक्षाओं को परिणाम में बदलता है।
ऐसे में इनके बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि समन्वय ही सुशासन की पहचान होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी का नेतृत्व इसी समन्वय और संवेदनशीलता का प्रतीक है। उनकी सरलता, सहजता और जमीन से जुड़ी कार्यशैली यह संदेश देती है कि शासन का उद्देश्य पद का प्रदर्शन नहीं है बल्कि जनता की सेवा है। मुख्यमंत्री जी बार-बार यह साबित कर चुके हैं कि किसी भी सरकार की सफलता उसकी योजनाओं से नहीं, बल्कि उन योजनाओं के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने से मापी जाती है। मेरा मानना है यही सोच आज पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र के लिए मार्गदर्शक बननी चाहिए।
दुर्भाग्य से कभी-कभी व्यवस्था में ऐसे हालात भी बन जाते हैं जब कुछ अधिकारी स्वयं को व्यवस्था का स्थायी केंद्र मानने लगते हैं और जनप्रतिनिधियों को केवल अस्थायी पात्र समझने की भूल कर बैठते हैं। ऐसे लोगों की यह सोच लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है। अधिकारी शासन व्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन जनप्रतिनिधि भी जनता की आवाज़ हैं। दोनों में से किसी एक की उपेक्षा लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करती है।
प्रशासन का दायित्व नियमों और प्रक्रियाओं को लागू करना है, जबकि जनप्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं और समस्याओं को शासन तक पहुँचाने का माध्यम होते हैं। दोनों की भूमिकाएँ अलग हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है जनहित।
आज जब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ विकास और सुशासन की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह और अधिक आवश्यक हो जाता है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बना रहे। अनावश्यक विवाद, अहंकार और टकराव केवल विकास की गति को धीमा करते हैं।
इसका नुकसान किसी व्यक्ति या पद को नहीं, बल्कि उस आम नागरिक को होता है जिसने व्यवस्था पर भरोसा करके अपने भविष्य की उम्मीदें उससे जोड़ी हैं। यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र में न कोई अधिकारी सर्वशक्तिमान है और न कोई जनप्रतिनिधि कानून से ऊपर। किसी भी मतभेद का समाधान संवाद, संवेदनशीलता और संवैधानिक प्रक्रियाओं में ही निहित है। पद की शक्ति क्षणिक होती है, लेकिन व्यवहार की छाप स्थायी। जनता उन अधिकारियों को वर्षों तक सम्मान देती है जिन्होंने अधिकार से अधिक दायित्व को महत्व दिया और उन जनप्रतिनिधियों को याद रखती है जिन्होंने सहयोग और संवाद के माध्यम से विकास का रास्ता बनाया।
आखिरकार, सुशासन का अर्थ केवल योजनाएँ बनाना नहीं, बल्कि ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करना है जिसमें सम्मान, संवाद और जवाबदेही साथ-साथ चलें। जब प्रशासन अपनी दक्षता और ईमानदारी से योजनाओं को लागू करता है, जनप्रतिनिधि जनता की आकांक्षाओं को व्यवस्था तक पहुँचाते हैं और नेतृत्व सबको साथ लेकर चलता है, तब जाकर विकास केवल सरकारी दस्तावेज़ों में नहीं बल्कि लोगों के जीवन में दिखाई देता है।
छत्तीसगढ़ को विकसित और समृद्ध राज्य बनाने का सपना किसी एक व्यक्ति, एक विभाग या एक पद से पूरा नहीं होगा। यह सपना तभी साकार होगा जब व्यवस्था से जुड़े सभी लोग स्वयं को सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का संरक्षक मानेंगे। याद रखना होगा कि इतिहास पदों को नहीं, जनसेवा की भावना को याद रखता है। और यही भावना सुशासन की सबसे बड़ी पहचान है।



