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Women Reservation Law 2026 India : देश में लागू तो हुआ पर अभी नहीं मिलेगा लाभ, जानिए क्या है वो ‘तकनीकी पेंच’ जिसने बढ़ाया इंतजार

भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा संवैधानिक कदम (Women Reservation Law 2026 India) उठाया गया है। केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण कानून को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई (अधिसूचित) कर दिया है।

16 अप्रैल 2026 से यह कानून पूरे देश में प्रभावी तो हो गया है, लेकिन हकीकत यह है कि चुनाव में इसका फायदा लेने के लिए आधी आबादी को अभी और लंबा इंतजार करना होगा। इस नोटिफिकेशन के बाद भी कई ऐसे तकनीकी और कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं, जिसने इस पूरे मामले को पेचीदा बना दिया है।

आधी रात को नोटिफिकेशन और ‘तकनीकी’ वजहें (Women Reservation Law 2026 India)

केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला यह ऐतिहासिक कानून अब कागजों पर अमल में आ चुका है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक यह साफ नहीं किया गया है कि संसद में चल रही तीखी बहस के बीच अचानक 16 अप्रैल की तारीख को ही इसे अधिसूचित करने की जरूरत क्यों पड़ी।

सरकारी गलियारों में इसे केवल “तकनीकी कारण” बताया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे आगामी परिसीमन और जनगणना की कानूनी अनिवार्यताएं जुड़ी हो सकती हैं।

क्यों अटक गया है रिजर्वेशन का फायदा?

कानून लागू होने के बावजूद वर्तमान लोकसभा या हालिया विधानसभा चुनावों में महिलाओं को इसका लाभ (Women Reservation Law 2026 India) नहीं मिल सकेगा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आरक्षण का क्रियान्वयन ‘परिसीमन’ (Delimitation) की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।

नियमों के मुताबिक, साल 2027 में होने वाली अगली जनगणना के आंकड़े आने के बाद ही निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण होगा। जब तक परिसीमन का यह काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इस तकनीकी पेंच के कारण कानून बनने के बाद भी यह वर्तमान सदन में प्रभावी नहीं हो पा रहा है।

2029 या 2034: कब खुलेगी आरक्षण की खिड़की?

सितंबर 2023 में जब यह बिल ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से पारित हुआ था, तब इसके प्रावधानों के अनुसार आरक्षण 2034 से पहले लागू होता नहीं दिख रहा था। लेकिन वर्तमान में सरकार द्वारा संसद के विशेष सत्र में लाए गए तीन नए विधेयकों का उद्देश्य इसी समयसीमा को घटाकर 2029 करना है।

सरकार चाहती है कि 2027 की जनगणना और उसके तुरंत बाद होने वाले परिसीमन को तेज गति से पूरा कर लिया जाए, ताकि अगले लोकसभा चुनाव (2029) में ही महिलाओं को विधानसभाओं और संसद में उनका हक मिल सके।

विपक्ष की आशंका और सरकार का पक्ष

संसद के भीतर इस मुद्दे पर सियासत भी गरमाई हुई है। विपक्षी दलों का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर है, तो इसे परिसीमन और जनगणना की शर्त से मुक्त करके वर्तमान सीटों के आधार पर ही लागू किया जाना चाहिए।

वहीं, सत्ता पक्ष का दावा है कि बिना परिसीमन के आरक्षण लागू करना संवैधानिक जटिलताएं पैदा कर सकता है। फिलहाल, गजट नोटिफिकेशन जारी होने के बाद अब गेंद पूरी तरह से जनगणना निदेशालय और परिसीमन आयोग के पाले में है। जब तक घर-घर जाकर सिर गिनाने (जनगणना) का काम पूरा नहीं होता, तब तक महिलाओं का संसद पहुंचने का सपना फाइलों में ही कैद रहेगा।

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