Women Representation BJP : गजबे हाल ए भैया! महिला आरक्षण की बात, पर संगठन में महिलाओं की हिस्सेदारी बेहद कम

संसद में महिला आरक्षण और नारी सशक्तिकरण को लेकर लगातार मुखर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी अब अपने ही संगठनात्मक फैसलों को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। राजस्थान में भारतीय जनता युवा मोर्चा की नई प्रदेश कार्यकारिणी में महिलाओं को बेहद सीमित जगह मिलने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
भारतीय जनता युवा मोर्चा राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष Shankar Gora ने 21 मई को 63 सदस्यीय प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा की। लेकिन इस सूची में केवल तीन महिलाओं को जगह मिली है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि संगठन के प्रमुख पदों पर एक भी महिला को जिम्मेदारी नहीं दी गई।
बड़े पदों से महिलाओं की पूरी दूरी
प्रदेश उपाध्यक्ष महामंत्री मंत्री कोषाध्यक्ष कार्यालय प्रभारी और मीडिया प्रभारी जैसे महत्वपूर्ण पद पूरी तरह पुरुष नेताओं के हिस्से में गए। 21 प्रवक्ताओं की सूची में भी केवल वृंदा राठौड़ अकेली महिला हैं।
महिलाओं को मुख्य रूप से प्रशिक्षण प्रभारी और सह प्रभारी जैसे सीमित दायित्व दिए गए हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह यह सवाल उठ रहा है कि जब भाजपा महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने की बात करती है तो संगठन में उसकी झलक क्यों नहीं दिखाई देती।
महिला आरक्षण पर आक्रामक रही थी भाजपा
हाल के महीनों में महिला आरक्षण को लेकर भाजपा लगातार विपक्ष पर हमलावर रही है। संसद में नारी शक्ति वंदन विधेयक को लेकर भाजपा नेताओं ने कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों पर महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया था।
खुद शंकर गोरा ने भी महिला आरक्षण के समर्थन में लगातार बयान दिए थे और विपक्ष पर महिलाओं का अपमान करने का आरोप लगाया था। लेकिन अब उनकी ही कार्यकारिणी में महिलाओं की बेहद कम भागीदारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
कांग्रेस ने साधा निशाना
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा महिला सशक्तिकरण की बात तो करती है लेकिन जब संगठन में वास्तविक भागीदारी देने की बारी आती है तो महिलाएं पीछे छूट जाती हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि भाजपा सच में महिलाओं को बराबरी देना चाहती तो निर्णय लेने वाले पदों पर भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिखाई देता।
राजनीतिक विश्लेषकों ने भी उठाए सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 63 सदस्यीय कार्यकारिणी में केवल तीन महिलाओं को जगह मिलना बेहद कम प्रतिनिधित्व माना जाएगा। उनका मानना है कि यदि महिला आरक्षण और नारी शक्ति को लेकर पार्टी गंभीर है तो संगठन में कम से कम एक तिहाई भागीदारी महिलाओं की होनी चाहिए थी।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि राजनीतिक दल अक्सर महिलाओं को चुनावी अभियान और प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित रखते हैं लेकिन संगठनात्मक शक्ति और फैसलों में उनकी भूमिका सीमित कर दी जाती है।
आगे बदलाव का दावा
पूरे विवाद के बीच शंकर गोरा ने कहा है कि संगठन में अभी कुछ स्थान खाली हैं और आने वाले समय में महिलाओं को और जिम्मेदारियां दी जाएंगी। हालांकि फिलहाल नई कार्यकारिणी को लेकर उठे सवाल भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहे हैं। महिला मतदाताओं को साधने की राजनीति के बीच अब पार्टी के सामने यह चुनौती है कि वह अपने राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक हकीकत के बीच दिख रहे अंतर को कैसे दूर करती है।



