अंतत: सफल हुआ संघ का ऑपरेशन ‘सौदान सिंह’

The operation of the Sangh was finally successful 'Saudan Singh'

BJP Senior Leader Saudan Singh

विशेष संवाददाता
रायपुर। BJP Senior Leader Saudan Singh: वर्ष 2020 के अंतिम दिवस तक भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री रहे सौदान सिंह एक झटके में न केवल इस पद से हटा दिए गए अपिुत छत्तीसगढ़ से भी विदा कर दिए गए। इसी के साथ संघ से भी दाना पानी बंद कर दिया गया।

अब उनके पास राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का कद हीन पद और जमीन हीन पंजाब-हरियाणा राज्य ही रह गया है जहां उनके कंधे भाजपा को खड़ा करने की जिम्मेदारी दी गई है। चंडीगढ़ उनका मुख्यालय होगा, जहां छत्तीसगढ़ जैसा ऐशो आराम और ऊंगलियों में नाचने वाले नेता नहीं होंगे। छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक वे सियासत के ऐसे खिलाड़ी रहे जिसके इर्द-गिर्द सत्ता नाचती थी।

सत्ताधीश चरण परिक्रमा करते थे और धनलक्ष्मी बरसती थी। इसके चलते धमक ऐसी थी कि सांसद-विधायक तो बगैर उनकी अनुमति के मिल ही नहीं सकते थे। संघ के जमीनी कार्यकर्ता रामलाल व बीएल संतोष जैसों को भी मिलने के लिए सोचना पड़ता था। धमक ऐसी कि भाजपा का प्रदेश कार्यालय सीएम हाउस की तरह प्रोटोकालयुक्त बना दिया गया था।

सौदान सिंह (BJP Senior Leader Saudan Singh) छत्तीसगढ़ में वर्ष 2001 से कार्यरत रहे। तब से उनके कंधे पर संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी रही। इस दौर में संगठन तो मजबूत हुआ लेकिन मजबूर सियासत का दौर भी शुरू हुआ। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस से जुदा होकर शरद पवार की पार्टी से चुनाव मैदान में उतरे। तब उनकी पार्टी को 7 फीसदी मत मिले।

इसी से भाजपा को सत्ता मिली लेकिन श्रेय मिला सौदान सिंह को, वे संगठन के मास्टर माइंड घोषित कर दिए गए। वर्ष 2008 व 2013 के विधानसभा चुवाव में कांग्रेस के ही अजीत जोगी भाजपा की जीत के आधार स्तंभ बने लेकिन सौदान सिंह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में संगठन का सितारा बन गए।

इसी दौर में प्रदेश व क्षेत्र संगठन महामंत्री से सीधे वर्ष 2013 में राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री बना दिए गए। इसके बाद उनकी उड़ान इतनी ऊंची हो गई कि मोदी-शाह-नड्डा के बाद उनका नंबर आने लगा। इसी दौर में वर्तमान में भाजपा के संगठन के शीर्ष पद पर आसीन बीएल संतोष उनके अधीनस्थ हुआ करते थे।

तब ऐसा भी दौर आया जब सौदान सिंह (BJP Senior Leader Saudan Singh) उनको हिकारत से देखकर झटक दिया करते थे। वाकया वर्ष 2016 का है, तब डॉॅ. रमन सिंह सरकार के चौथी पारी के लिए छत्तीसगढ़ की जमीनी थाह लेने उन्हें पर्यवेक्षक बना कर भेजा गया था। बीएल संतोष तीन दिन रह कर सूबे के अमूमन सभी नेताओं को बातचीत कर रिपोर्ट तैयार की जिसके अनुसार बीजेपी बुरी तरह से वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में पराजित हो सकती थी।

वे अपनी रिपोर्ट केंद्रीय संगठन को भेज रहे थे, तब सौदान सिंह ने उनसे बेहद गंदे ढ़ंग से पेश आते हुए उनकी रिपोर्ट रद्दी की टोकरी में फेंक दी थी। वक्त का पहिया ऐेसा घूमा कि वही बीएल संतोष उनके वनवास के किरदार बन गए। भाजपा के नेताओं की माने तो सौदान सिंह की कद कटाई अथवा छत्तीसगढ़ से रुखसत करने का प्रयास पिछले चार साल से चल रहा था।

तब उनकी ऊपर व नीचे ऐेसी पकड़ थी कि खिलाफ में शिकायत तो दूर किसी की हलक से बात भी नहीं निकल पाती थी। बीएल संतोष को राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री (BJP Senior Leader Saudan Singh) बनाए जाने के बाद से ही संघ स्तर पर सौदान सिंह के दरकिनार किए जाने के कयास लगने शुरू हो गए थे, लेकिन भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपनी टीम में एक बार फिर राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री बना दिया साथ ही छत्तीसगढ़ का प्रभार भी दिया।

इससे लगने लगा सौदान सिंह का सिक्का एक बार फिर चल गया लेकिन यह सही नहीं था। नड्डा छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहते उनके सभी दांव पेंच व सियासी रसूख से अवगत थे। कहीं न कहीं सताए भी थे। बीएल संतोष के बाद जब डी. पुरंदेश्वरी की छत्तीसगढ़ प्रभारी के रूप में नियुक्ति हुई तो एक बार फिर बीएल संतोष व संघ के नेताओं ने पर्दे के पीछे से जोर लगाया और सौदान सिंह किनारे लगा दिए गए।

इसमें प्रमुख भूमिका छत्तीसगढ़ के ही एक संघ नेता की रही जो लंबे काल तक सौदान सिंह के आसमानी संगठन क्षमता व सियासी राजशाही को करीब से देखकर थक गए थे। संघ की साल में दो बार समीक्षात्मक बैठक होती है। इसी कड़ी में 12 दिसंबर 2020 को संघ की इलाहाबाद (प्रयागराज) में बैठक थी।

इसमें सौदान सिंह (BJP Senior Leader Saudan Singh) को हटाए जाने की पटकथा लिख दी गई। उनके छत्तसीगढ़ में बीते करीब 20 साल की तमाम तरह की कार्यप्रणाली को सभी के समक्ष रखा गया। बैठक में उनके संागठनिक पांडित्य को तब सिवाय भोग विलास के और नाम नहीं दिया गया। यह बात पूर्व से ही अवगत बीएल संतोष को जम गई। तब मोदी-शाह-नड्डा तक यह बात पहुंचाई गई और 31 दिसंबर 2020 को ऑपरेशन सौदान सिंह मुकम्मल कर दिया गया।

अब तक केंद्रीय स्तर पर उनके बारे में बात नहीं पहुंच पाती थी। इससे यह लगता था सौदान सिंह की करिशमाई संागठनिक क्षमता के कारण ही छत्तीसगढ़ में लगातार तीन बार भाजपा की सरकार बनाने में सफलता मिली, जबकि सच्चाई यह न थी। छत्तीसगढ़ में उनका अपना कॉकस बना हुआ था। उन्हीं नेताओं की चलती थी जो उनके खास थे।

आलम यह था कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी डॉ. रमन सिंह बेबस थे। सूबे के सभी संभाग में उनके खास नेता थे जिनके इशारे के बगैर सत्ता व संगठन में पत्ता नहीं डोलता था। ये लोग पांच से लेकर पूरे पंद्रह साल तक सत्ता की मलाई खाते रहे। ये मलाई के बदले आका के लिए एटीएम थे। सौदान सिंह सत्ता के पर्याय बन गए थे।

उनके बगैर न तो लोकसभा अथवा राज्यसभा की किसी सांसदी मिल सकती थी और न ही विधानसभा चुनाव में कोई किस्मत आजमा सकता था। अब लंबे काल बाद भाजपा के दबे कुचले नेता राहत की सांस ले रहे हैं।

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