संपादकीय

संपादकीय: गनतंत्र पर भारी पड़ा गणतंत्र

बस्तर को माओवादियों ने बर्बाद किया है डबल इंजन की सरकार आबाद करेगी
Editorial:
नवप्रदेश छत्तीसगढ़ को नक्सलियों के आतंक से मुक्त कराने के बाद अब आदिवासी बहुल बस्तर में विकास की बयार बहाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार नया रोडमैप तैयार कर रही हैं। इसी सिलसिले में छत्तीसगढ़ प्रवास पर आये केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ठीक ही कहा है कि अब बस्तर से गनतंत्र का पूरी तरह सफाया हो गया है और आजादी के बाद पहली बार बस्तर 31 मार्च 2026 को सही मायनों में आजाद हुआ है।

वास्तव में राज्य और केन्द्र की डबल ईजन सरकार में दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद के अभिशाप से मुक्त कराने में जो ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है उससे अब दशकों से पिछड़े रहे बस्तर के चहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

जहां गनतंत्र पर आखिरकार गणतंत्र भारी पड़ा। इसके लिए प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार तथा केन्द्र सरकार और खासतौर पर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह साधुवाद के पात्र हैं। छत्तीसगढ़ प्रवास पर आये अमित शाह ने बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ को कई बड़ी सौगातें दी है और उन्होंने कहा है कि बस्तर में नक्सलियों ने छह दशकों के दौरान जो नुकसान किया है उसकी भरपाई हम पांच सालों के भीतर कर देंगे और एक साल में ही बस्तर में भी राजधानी रायपुर जैसा विकास दिखने लगेगा।

उन्होंने भरोसा दिलाया है कि आदिवासी बहुल बस्तर के विकास में केन्द्र सरकार अपनी ओर से कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने यही संदेश दिया है कि जिस बस्तर को बारूद की ढेर पर बिठाकर माओवादियों ने बर्बाद किया था उसे अब डबल ईजन की सरकार आबाद करेगी और वहां विकास की गंगा बहाने के लिए भागीरथ प्रयास किये जाएंगे।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद केन्द्र और राज्य सरकार ने मिलकर बस्तर से नक्सलवाद को जड़मूल से खत्म करने का संकल्प लिया था और इसके लिए 31 मार्च 2026 की तारीख तय की गई थी। इस लक्ष्य को हासिल करने में डबल ईजन की सरकार सफल हुई और 31 मार्च 2026 का दिन न सिर्फ छत्तीसगढ़ प्रदेश बल्कि पूरे देश के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया है।

इस तिथि को चिरअस्थाई बनाने के लिए राज्य और केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह 31 मार्च 2026 को बस्तर की वास्तविक आजादी के रूप में अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाए। बहरहाल बस्तर से नक्सली आतंक के सफाए के बाद अब वहां विकास को रफ्तार देना राज्य और केन्द्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि पिछले छह दशकों में बस्तर इस कदर बिछड़ चुका है कि वहां आज भी सुदुरपूर्व गांवों तक पीने का स्वच्छ पानी भी नहीं पहुंच पाया है। शिक्षा और स्वास्थ सुविधाएं तो आज भी दूर की कौड़ी बनी हुई है।

बस्तर के गांवों में गरीब आदिवासियों की अंधेरी कुटिया तक विकास की रौशनी बगराने के लिए वृहद कार्य योजना बनानी होगी और उसे युद्ध स्तर पर अमलीजामा पहनाना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि डबल ईजन की सरकार बस्तर के हालात बदलने में निश्चित रूप से सफल होगी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जो यह एलान किया है कि पांच सालों के भीतर पिछले छह दशकों के नुकसान की भरपाई की जाएगी इस संकल्प को पुरा करने में केन्द्र और राज्य सरकार निश्चित रूप से कामयाब होगी।

रही बात बस्तर में नक्सलियों के सफाए के बाद वहां शांति की स्थापना करने की तो इसके लिए भी सरकार को आने वाले कुछ वर्षों तक वहां विशेष सर्तकता बरतनी होगी ताकि जो मुठ्ठीभर नक्सली भूमिगत हो गये हैं या प्रदेश छोड़कर पलायन कर गये हैं वे फिर से वहां अपना पांव पसारने का दुहसाहस न करें। बहरहाल अब बस्तर के दिन बहुरने की उम्मीद बंधना सुखद अनुभुति है।

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