संपादकीय

संपादकीय: अमेरिका के जाल में फंसा पाक

Editorial: अमेरिका और ईरान के बीच शांतिवार्ता विफल हो जाने के बाद से पाकिस्तान की पूरी दुनिया में भद पिट गई है। अमेरिका के दबाव में आकर पाकिस्तान ने किसी तरह ईरान को बातचीत की टेबल पर लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी और उसने सोचा था कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता सफल हो जाती है तो पाकिस्तान के सारे पुराने पाप धुल जाएंगे और पाकिस्तान भारत को पछाड़ कर विश्वगुरु की भूमिका में नजर आएगा। किन्तु उसके सारे सुनहरे सपने चूर-चूर हो गए और यह वार्ता विफल हो जाने से अब पाकिस्तान की टेंशन बढ़ गई है।

इधर ईरान उसका दुश्मन बन गया है और इजराइल पहले ही पाकिस्तान को सबक सिखाने की चेतावनी दे चुका है। अमेरिका के दबाव में आकर ही पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ सऊदी अरब में मोर्चा संभालने के लिए अपने तेरह हजार सैनिक तथा 18 लड़ाकू विमान भेज दिए हैं। जिसकी तैनाती सऊदी अरब ने ईरान की सीमा के पास की है। गौरतलब है कि इसके पहले भी पाकिस्तान ने सऊदी अरब में दस हजार सैनिक भेजे थे। दरअसल 2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता किया था जिसके तहत यदि कोई देश पाकिस्तान पर हमला करता है तो इसे सऊदी अरब अपने खिलाफ हमला मानेगा और जंग में पाकिस्तान का साथ देगा। इसी तरह यदि कोई सऊदी अरब पर आक्रमण करेगा तो इसे पाकिस्तान भी अपने खिलाफ आक्रमण मानकर लड़ाई में सऊदी अरब का साथ देगा।

ईरान और अमेरिका के बीच चली जंग में जब ईरान ने अमेरिका परस्त खाड़ी देशों पर भी बमबारी शुरू कर दी तो इसकी चपेट में सऊदी अरब भी आया और ईरान की मिसाइलों से सऊदी अरब को भारी नुकसान उठाना पड़ा। तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को उनके बीच हुए रक्षा समझौते की याद दिलाई लेकिन ईरान के डर से पाकिस्तान ने सऊदी अरब की कोई मदद नहीं की। इससे नाराज होकर सऊदी अरब ने पाकिस्तान को कर्ज के रूप में जो मोटी रकम दे रखी है उसने उसे वापस मांगना शुरू कर दिया। जिसे चुका पाना पाकिस्तान के लिए असंभव की हद तक कठिन काम है। उसके साथ तो यह कहावत लागू हो रही है कि नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या?

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। ऐसे में तो उसे और कर्ज की जरूरत है। इस स्थिति में वह किसी का पुराना कर्ज भला कैसे लौटा सकता है। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच समझौता वार्ता विफल हो गई तो सऊदी अरब के दबाव के आगे झुक कर उसे उसकी सैन्य मदद करनी ही पड़ी। नतीजतन अब ईरान से उसने दुश्मनी मोल ले ली है। फिलहाल तो ईरान अभी अमेरिका और इजराइल से दो-दो हाथ करने में लगा हुआ है। लेकिन इससे निपटते ही वह पाकिस्तान की भी खबर लेगा। दरअसल पाकिस्तान की मजबूरी यह है कि वह कर्ज में आकंठ डूबा हुआ है उसके ऊपर 80 लाख करोड़ का कर्जा है जो पाकिस्तान की जीडीपी का 72 प्रतिशत है।

पाकिस्तान के प्रत्येक नागरिक के सिर पर 3.35 लाख रुपए का कर्ज है। यही वजह है कि उसने सुपारी लेकर अपने सैनिकों को खाड़ी देशों में भेजना शुरू कर दिया है। उसकी इस हरकत से ईरान किस कदर नाराज है इसका एक उदाहरण कल ही उस समय सामने आया जब तेल लेकर पाकिस्तान जा रहे जहाज को होर्मुज से ईरान ने वापस लौटा दिया। बाद में इस जहाज को ईरान ने भारत के लिए रवाना कर दिया। गौरतलब है कि इसके पहले भी चीन जा रहे 7 जहाज भी भारत भेजे गए थे। यह है भारत की कूटनीतिक सफलता जिसकी नकल करते हुए पाकिस्तान ने होशियारी दिखाने की कोशिश की थी लेकिन अब उसकी परेशानी का सबब बन गई है।

यदि ईरान और अमेरिका के बीच जंग होती है जो कि होने की पूरी संभावना है तो निश्चित रूप से अमेरिका ईरान पर हमला करने के लिए पाकिस्तान की जमीन और पाकिस्तान के एयरबेसों का इस्तेमाल करेगा। ऐसी स्थिति में ईरान की मिसाइलों का मुंह भी पाकिस्तान की ओर घूमेगा और पाकिस्तान के लिए गेहूं के साथ घुन पिसाने वाली कहावत अक्षरश: चरितार्थ हो जाएगी। होर्मुज पर कब्जे को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच जंग के हालात निर्मित हो चुके हैं और यह जंग यदि लंबी चलती है तो दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कराने का ठेका ले चुके पाकिस्तान को भी इस जंग का हिस्सा बनना पड़ेगा और ईरान के खिलाफ सऊदी अरब तथा अमेरिका की ओर से युद्ध लडऩा पड़ेगा। ऐसे में उसे भी ईरान की तोप का भाजन बनना होगा और इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

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