संपादकीय: आधे देश में कुदरत का कहर
इस बार मानसून राहत के साथ ही आफत भी लेकर आया है। महाराष्ट्र गुजरात, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और जम्मू कश्मीर सहित आधे देश में अतिवृष्टि के रूप में कुदरत का कहर टूट रहा है। देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में तो दो दिनों की मुसलाधार बारिश के कारण जनजीवन बुरी तरह अस्त व्यस्त हो गया है। मुंबई के लिए यह कोई नई बात नहीं है। हर साल बरसात के मौसम में मुंबई की सड़को पर समंदर आ ही जाता है किन्तु इस बार मानसून की पहली ही फुहार में मुंबई में कहत ढा दिया है।
सैकड़ो पेड़ जड़ से उखड़ गये हैं और ऐसी ही एक पेड़ के नीचे बारिश से बचने के लिए खड़े दो लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गये। भारी बारिश के कारण एक पुरानी चाल से ढह जाने के कारण पांच बच्चों सहित छह लोगों की मौत हो गई।
एक अन्य घटना में भी दो अन्य लोग मौत के मुंह का निवाला बन गये। महाराष्ट्र सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए पांच पांच लाख रूपये का मुआवजा देकर अपने कत्वर्य की इतिश्री कर ली है। वहीं हर बार की तरह भी इस बार भी बारिश के मौसम में पानी की निकासी की विकट समस्या को हल करने में नाकाम रही बीएमसी सिर्फ लोगों को यह नसीहत दे रही है कि वे बहुत जरूरी काम होने पर ही घर से बाहर निकलें। बारिश के चलते यदि लोग अपने घरों में ही दुबके रहेंगे तो उनके घर का चूल्हा कैसे जलेगा। जाहिर है मुंबई में जल भराव की समस्या स्थाई समस्या बन चुकी है और इसके समाधान में राज्य सरकार और बीएमसी बुरी तरह नाकाम रही है।
मुंबई की तरह ही कमोवेश अन्य महानगरों और शहरों की भी यही स्थिति है जहां लागातार यदि दो दिनों तक पानी गिर जाये तो वहां की सारी सड़के नदी और नाले के रूप में तब्दिल हो जाती है और इस वजह से न सिर्फ जन जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है बल्कि लोग दुर्घटना का भी शिकार हो जाते हैं। दरअसल बारिश के पूर्व नालियों की सफाई करने के साथ ही जलभराव की समस्या को दूर करने की जैसी तैयारी नगरी निकायों को करनी चाहिए वे नहीं कर पाते। वे तो प्यास लगने पर ही कुंआ खोदने वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं जिसकी वजह से बारिश के मौसम में लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
महानगरों और शहरों सहित कई कसबों में वहां तो और भी भयावह स्थिति बन जाती है जहां निचले भागों में लोगों के घर बने होते हैं ऐसे घरों में तो बारिश के साथ ही नालियों का गंदा पानी भी घरों में घुस जाता है और लोगों को रतजगा करने पर बाध्य होना पड़ता है। इस बार तो मानसून ने और भी ज्यादा कहर ढाया है। मुंबई पूणे रेल मार्ग पर भारी चट्टान के गिर जाने से रेल की पटरियां उखड़ गई जिसकी वजह से इस प्रमुख रेल मार्ग पर ट्रेनों की आवाजाही बंद करनी पड़ी हैं। इसी तरह जम्मू कश्मीर के किस्तवाढ़ में प्रकृति का प्रकोप टूटा है वहां बादल फटने से भारी तबाही हुई है।
गुजरात में भी कुदरत ने जमकर कहर ढाया है वहां के अमरेली में तो नेशनल हाईवे का एक बड़ा हिस्सा ही बह गया है अन्य राज्यों में भी भारी बारिश के कारण मची तबाही की खबरें सामने आ रही हैं। अभी तो यह बारिश की शुरूआत ही हुई है। अभी तो बरसात का मौसम बाकी है। आने वाले दिनों में अगर इसी तरह और भारी बारिश हुई तो कितनी तबाही मचेगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
अभी भी समय है कि बरसात के मौसम जलभराव की समस्या और पानी निकासी की समुचित व्यवस्था करने के लिए युद्ध स्तर पर कार्यवाही की जाये ताकि मानसून आफत न लगे। वैसे तो प्रकृति के आगे हम सब लाचार हैं लेकिन एहतियाती कदम उठाकर प्रकृति के प्रकोप से काफी हद तक खुद को बचा तो सकते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए की सरकार इस बारे उचित पहल करेगी।



