बातों…बातों में…! सुकांत राजपूत की कलम से..बंगला गुलजार…और मरवाही उपचुनाव

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बंगला गुलजार…

मामला पावस सत्र (monsoon session) के वक्त का है। जांजगीर-चांपा के सबसे खास व्यक्तियों में (Special people) शुमार गुलजार (Sumar Gulzar Raipur) रायपुर पहुंचा। नाम और जिसके वो करीब है उनके लिए काम बहुंत ही छोटा था। लेकिन जिस तरह इतने खास का अदना सा काम भी तब और छोटा हो गया जब मंत्री ने पुत्र और पुत्र ने पीए से मिलने का फरमान दिया। बस फिर क्या था मंत्री बंगले से ही सदन तक मोबाइल घनघना गया।

गुलजार ने कहा मंत्री जी काफी व्यस्त हैं इन्हें 4-5 विभाग और दे देना चाहिए। काम तो हुआ लेकिन मंत्री बंगले को गुलजार की आवाज ने इतना गुलजार कर दिया कि मंत्री पुत्र की भी घिग्घी बंध गई। पिता के लिए एक तरह से मुसीबत बन गए नवसिखुआ जूनियर मंत्री पुत्र का सारा काम पीए के भरोसे चल रहा है।

नीली अब खाकी…

18 साल बाद खाकी अब नीली से सहीं मायनों में खाकी होगी। इसका फरमान भी पुलिस महानिदेशक ने जारी कर दिया है। पुरुषों के रंग में रंगी खाकी ड्रेस अब महिला पुलिस भी धारण करेंगी। नीली उतारकर खाकी सलवार-कुर्ता अनिवार्य करने के पीछे एक समान गणवेश की नीति पर व्यवस्था बदली जा रही है।

पहले पुरुष पुलिस को खाकी और महिला पुलिस को नीली डे्रस दी जाती थी। दो रंग से समानता का अधिकार भी छिनता दिखता था और खासकर गरमी में पसीने से तरबतर नीला रंग भद्दा भी लगता था। खाकी में अब गरमी नहीं लगेगी और रंग भी महकमें का चोखा, यानि की एक रुपता वाला होगा। बता दें कि खाकी पेंट-शर्ट भी महिला पुलिस को दिया जाता था और नीले रंग की सलवार-कुर्ता भी। प्रदेश में करीब 70 हजार पुलिस कर्मियों में 35 फीसदी महिला भी हैं।

पहले ही सौगात…

पहले से ही मरवाही में जोगी परिवार की मत संख्या ज्यादा है। अब जोगी जी के जाने के बाद सहानुभूति भी परिवार का संबल है। ऐसे में चुनावी नजराना तो आचार संहिता की भेंट चढ़ जाता है। इसलिए जो भाजपा-कांग्रेस के दिमाग में नहीं आया वो जकांछ ने कर दिखाया। बातों ही बातों में सियासी तुर्रमों का कहना है कि इस नए और अनोखे तरीके से चुनावी नजराना पेश करने की नई परंपरा न शुरु हो जाए।

दरअसल मरवाही में जोगी परिवार व्दारा जरुरती सामान और बर्तनों की भेंट चढ़ाते दिखे। लोग भी हुजूम लगाकर अपने सबसे लाडले सियासी परिवार की सौगात लेते रहे। यह सब देखकर तो प्रतिस्पर्धी सियासी पार्टियों और मरवाही उपचुनाव के लिए बनाए गए प्रभारियों के पैरों तले जमीन खिसक गई। क्योंकि न तो इसे चुनावी सौगात साबित कर सकते हैं और न ही सियासी आरोप लगा सकते हैं। पहले से ही मरवाही में मजबूत जोगी परिवार की यह सीट जीतने के लिए कांग्रेस लगी हुई है पर यह नजारा देखकर होश फाख्ता हैं।

3 पुत्र 1 पिता मोह…

महज दो साल में ही 3 मंत्री बंगले पुत्रों ने हाईजेक कर लिए हैं तो वहीं एक मंत्री के पिता ने कमान सम्हाल रखा है। अपने क्षेत्र के लोगों तक को तरजीह नहीं देते। खबर तो अब आम होने लगी है कि 3 मंत्री के पुत्र अपने-अपने पिता का काम सम्हाले हैं। जबकि एक मंत्री को उसके पिता ने सम्हाला है। काम की इस बंदरबांट में तबादला तक तो बात ठीक थी पर अब विभागीय बैठक में भी अफसरों को एजेंडा समझाने की कोशिशें हद पार कर रही हैं।

समानता यह है कि तीनों मंत्रियों के पुत्र हैं और तीनों ही पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के लिए कमाना चाहते हैं, लेकिन रेट लिस्ट में काफी अंतर है। मनचाही पोस्ंिटग के लिए किसी का मुंह सुरसा सा खुल रहा है तो कोई ठेका, परिवहन, नौकरी का जो रेट बोल रहा वह बाजार दर से बेमेल है। ऐसे में काम की आस में आने वाले भी बच्चे को देकर रिस्क नहीं लेना चाहते और पिता है कि मिलकर इंश्योर नहीं करता। काम बहुत हैं, बस अटके हैं और बिना कुछ हुए बंगला बदनाम हो रहा।

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