संपादकीय: बांग्लादेश में बदलाव की बयार

Editorial: भारत के पड़ौसी बांग्लादेश में तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की सपथ ले ली और उन्होंने अपने मंत्री मंडल में पहली बार दो हिन्दुओं को मंत्री बनाकर बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक नये अध्याय की शुरूआत की है इससे यह उम्मीद बंधी है कि बांग्लादेश में बदलाव की यह बयार भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्तों को एक नया आयाम देंगी। वैसे तो बांग्लादेश के अभ्यिुदय में भारत का ही सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1971 में जब शेख मुजीब के नेतृत्व में बांग्लादेश ने पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा प्राप्त करने के लिए संघर्ष का संखनाद किया था और पाकिस्तानी सेना ने इस जनआंदोलन को कुचलने के लिए बांग्लादेशियों पर अत्याचार की पराकाष्ठा पार कर दी थी।
तब भारत की तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और पाकिस्तान की सेना को आत्मसर्पण के लिए बाध्य कर दिया था। इसके बाद ही बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी मिली और वह एक स्वतंत्र राष्ट्र बन पाया। भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध मजबूत रहे किन्तु डेढ़ साल पूर्व शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट होने के बाद जब मोहम्मद युनूस ने बांग्लादेश के कार्यवाहक के रूप में कमान संभाली तो बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर जुल्म की इंतिहा हो गई। मोहम्मद युनूस ने भारत के खिलाफ जमकर जहर भी उगला और भारत के दुश्मन देशों पाकिस्तान व चीन से नजदीकियां बढ़ाई। यही नहीं बल्कि पाकिस्तान के आतंकियों को भी बांग्लादेश में पनाह दी।
बहरहाल अब मोहम्मद यूनुस की बांग्लादेश से बिदाई हो गई है लेकिन जाते जाते भी उन्होंने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों जिन्हें 7 सिस्टर कहा जाता है उसे लेकर विवादास्पद बयान दे दिया। अब बांग्लादेश नेश्नलिस्ट पार्टी के प्रमुख तारिक रहमान ने बांग्लादेश की कमान संभाल ली है और उन्होंने सबसे पहले मोहम्मद यूनुस को ही करारा झटका दिया है जिन्होंने कांस्टिटयूशन रिफॉर्म काउंसिल का गठन किया था लेकिन इसे तारिक रहमान ने अमान्य घोषित कर दिया।
साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब मोहम्मद युनूस की बांग्लादेश में कोई भूमिका नहीं होगी। यह बात भारत के हित में है। क्योंकि मोहम्मद युनूस ही वो शख्स हैं जिन्होंने भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध को खराब करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी तथा बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी पार्टी को बढ़ावा दिया था लेकिन अब इस पार्टी का भी बांग्लादेश में सुपड़ा साफ हो गया है हालांकि वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी है।
बांग्लादेश के लोगों ने शेख हसीना की पार्टी पर प्रतिबंध लगने के बाद बांग्लादेश नेश्नलिस्ट पार्टी पर भरोसा जताया और दो तिहाई बहुमत से तारिक रहमान की अगुवाई में उनकी सरकार बनवाई। उनके शपथग्रहण समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शिरकत की और उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संदेश दिया तथा भारत आने का निमंत्रण भी सौंपा। वैसे तो तारिक रहमान चाहते थे कि उनके शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद आये लेकिन भारत में एआई सम्मेलन की वजह से नहीं जा पाये फिर भी उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को बांग्लादेश भेजकर उन्हें यह संदेश दे दिया कि भारत बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने के लिए इच्छुक है।
तारिक रहमान भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि भारत के साथ रिश्ते बनाकर ही बांग्लादेश का विकास संभव है। गौरतलब है कि शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहते भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते बेहद मजबूत थे और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत बनी हुई थी जबकि उनकी सरकार का तख्तापलटने के बाद से मोहम्मद युनूस के कार्यकाल में उनके भारत विरोधी रवैये के चलते बांग्लादेश बदहाली का शिकार हो गया।
यहां तक की बांग्लादेश में भूखमरी के हालात बन गये थे। बांग्लादेश को डेढ़ साल में मोहम्मद युनूस ने बांग्लादेश को जिस गर्त में ढकेला है उससे बांग्लादेश को उबारना तारिक रहमान के लिए एक बड़ी चुनौती है और वे इस चुनौती का सामना भारत के सहयोग के बिना नहीं कर पाएंगे। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तारिक रहमान को यह भी संदेश भेजा है कि वे शेख हसीना के प्रति नरम रूख अपनाए और उनकी पार्टी पर लगे प्रतिबंध को हटाये। इस पर तारिक रहमान ने सकारात्मक रूख दिखाया है और शेख हसीना की पार्टी के तबाह हुए दफ्तरों के मरम्मत का काम तत्काल प्रभाव से शुरू करा दिया है। इससे शेख हसीना के बांग्लादेश वापसी की भी संभावना बढ़ गई है।



