Crop Protection : अल नीनो से बढ़ सकता है फसलों पर संकट, जानिए कीट और बीमारियों से बचाव के आसान उपाय
खरीफ सीजन में मौसम का बदलता मिजाज किसानों की चिंता बढ़ा सकता (Crop Protection) है। बारिश कम होने और तापमान बढ़ने की स्थिति में फसलों पर दोहरी मार पड़ती है। एक ओर खेतों में नमी घटती है, तो दूसरी ओर कीट और बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। ऐसे हालात में समय रहते सही कदम उठाना बेहद जरूरी हो जाता है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम में बदलाव के साथ खेती की रणनीति भी बदलनी चाहिए। यदि किसान शुरुआत से ही वैज्ञानिक तरीके अपनाएं, तो फसलों को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है और उत्पादन पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।
अल नीनो का खेती पर क्या असर पड़ता है Crop Protection
अल नीनो सक्रिय होने पर मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे बारिश कम होती है और गर्मी बढ़ जाती है। इसका सबसे ज्यादा असर खरीफ फसलों पर पड़ता है। धान, गन्ना, सोयाबीन और अन्य फसलों में पानी की कमी के कारण पौधों की बढ़वार रुक सकती है और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
कीट और बीमारियों का बढ़ जाता है खतरा
गर्म और शुष्क मौसम में माहू, सफेद मक्खी, तंबाकू की इल्ली और तना छेदक जैसे कीट तेजी से फैलते (Crop Protection) हैं। वहीं लीफ कर्ल वायरस, पीला मोजेक और पत्ती झुलसा जैसी बीमारियां भी फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मौसम में पौधे कमजोर हो जाते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
धान और गन्ने की खेती पर सबसे ज्यादा असर
धान और गन्ना ऐसी फसलें हैं जिन्हें अधिक पानी की जरूरत होती है। बारिश कम होने पर धान में कल्ले कम निकलते हैं और बालियों में दानों का भराव प्रभावित होता है। वहीं गन्ने की लंबाई, मोटाई और रस की मात्रा भी घट सकती है, जिससे किसानों की आय पर असर पड़ता है।
ऐसे करें फसलों का बचाव
विशेषज्ञ किसानों को बुवाई से पहले बीज उपचार करने, सूखा सहन करने वाली किस्मों का चयन करने और खेत में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग अपनाने की सलाह देते हैं। धान में सीधी बुवाई और गन्ने में ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों से पानी की बचत की जा सकती है।
वैज्ञानिक तरीके अपनाना होगा जरूरी
खाद का संतुलित उपयोग करें और जरूरत से ज्यादा यूरिया का प्रयोग (Crop Protection) न करें। खेतों की नियमित निगरानी करें तथा कीट नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप और पीले चिपचिपे ट्रैप जैसे उपाय अपनाएं। समय पर जल निकासी और फसल प्रबंधन से भी नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।



