BJP candidate from Khairagarh : विक्रांत सिंह को जो ख़ुशी मामा रमन नहीं दे पाए, वह अब जा कर मिली…

BJP candidate from Khairagarh : विक्रांत सिंह को जो ख़ुशी मामा रमन नहीं दे पाए, वह अब जा कर मिली…

BJP candidate from Khairagarh

BJP candidate from Khairagarh

0 बीजेपी संगठन और दिग्गज प्रभारियों को लोधी प्रत्याशी से ज्यादा उम्मीदें विक्रांत से है

सुकांत राजपूत/नवप्रदेश। BJP candidate from Khairagarh : बीजेपी ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की तारीख के एलान से पहले 90 में से 21 विधानसभा उम्मीदवारों के नामों की फेहरिस्त डालकर विपक्षी दलों को चौंका दिया है। भाजपा चुनाव समिति की बैठक में एक ही बार में पार्टी प्रत्याशियों के नाम की लिस्ट मंज़ूर होने और उसे जारी करने से पार्टी के रणनीतिकारों की चुनावी तैयारियों का आंकलन किया जा सकता है। फ़िलहाल बीजेपी की इस रणनीति का सूबे में गद्दी नशीन कांग्रेस और धमाकेदार एंट्री करने वाली ‘आप’ पार्टी के पास भी जवाब नहीं है।

छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा सीटों में से आधा दर्जन हाई प्रोफाइल सीटों के उम्मीदवारों की भी चर्चा सियासी ज़ुबान पर है। मज़े की बात यह है कि बीजेपी ने CM भूपेश बघेल के रिश्ते में भतीजे लगने वाले सांसद विजय बघेल को पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया है। इसी तारा EX CM डॉ रमन सिंह के भांजे विक्रांत सिंह को खैरागढ़ से बीजेपी उम्मीदवार घोषित किया है। बता दें विक्रांत लंबे समय से पार्टी का झंडा तब से उठा रहे हैं जब खैरागढ़ में CONG और CJCJ का वर्चस्व था। वर्तमान में भी लोधी बहुल क्षेत्र खैरागढ़ से कांग्रेस की महिला विधायक हैं। कांग्रेस ने यह सीट CJCJ विधायक स्वर्गीय देवव्रत सिंह के निधन के बाद उपचुनाव में जीती।

खैरागढ़; वैसे तो राजपरिवार और लोधी बहुल मतदाता की वजह से प्रत्याशी भी परंपरागत ही तय किया जाता रहा है। लेकिन पहली दफा बीजेपी ने किसी युवा, ऊर्जावान और विपरीत परिस्थितियों में भी भाजपा के लिए जद्दोजहद करते रहे हैं। हालांकि उनके मामा पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के रहते तक उन्हें उम्मीदवारी के लायक नहीं समझा गया। इस अनदेखी की क्या वजह रही इसका जवाब वक्त के गर्त में है, लेकिन मामा के सत्ता से उतरते ही उनका पहली ही सूची में बेखटके पार्टी प्रत्याशी बन जाना चौंकाने वाला फैसला है।

अनदेखी के बाद भी सक्रियता से मिला पुरस्कार

15 साल मामा के मुख्यमंत्री काल में टिकिट की दावेदारी के आड़ भी विक्रांत कामयाब नहीं हुए। बावजूद इसके उन्होंने बीजेपी पार्टी के लिए अपनी सक्रियता कम नहीं की। यह कहना गलत न होगा कि अपनों के रहते उनकी अधूरी सियासी इक्षाओं को अब पंख लगा है। युवाओं, राजपरिवार और पारिवारिक समर्थन के अलावा स्थानीय राजनीति की समझ प्रतिद्वंद्वी को सख्त टक्कर देने के लिए काफी है।

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