संपादकीय : डोनाल्ड ट्रंप की नाटो को धमकी

Editorial: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला तो कर दिया लेकिन अब यह जंग लगातार तेज होती जा रही है। स्थिति यह है कि डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बावजूद ईरान झुकने का नाम नहीं ले रहा है और अमेरिका तथा इजराइल को मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। खाड़ी देशों में अमेरिका के जितने भी सैन्य अड्डे थे उन्हें ईरान चुन चुन कर निशाना बना रहा है। अब तो ईरान ने अपनी सबसे घातक मिसाइल सेज्जिल का भी उपयोग करना शुरू कर दिया है। जिसकी मारक क्षमता ढाई हजार किलो मीटर तक है।
यही नहीं बल्कि ईरान ने होमूँज पर भी अन्य देशों के जहाजों की आवाजाही रोक कर पूरी दुनिया के लिए तेल और गैस का संकट खड़ा कर दिया है। इससे बौखलाकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो खुद होर्मूज के पास अपना युद्धपोत भेजने से डर रहे हैं। उन्होंने नाटो से इसके लिए मदद मांगी है। यही नहीं बल्कि उन्होंने चीन से भी मदद की अपील की है। किन्तु कोई भी देश उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं है। जर्मनी में तो दो टूक शब्दों में कह दिया है कि इस युद्ध से नाटों का कोई लेना देना नहीं है।
फ्रांस ने भी वहां अपना युद्धपोत भेजने से साफ इंकार कर दिया है। इंग्लैंड और जापान ने भी इससे किनारा कर लिया है। नतीजतन अब डोनाल्ड ट्रंप नाटो को इसके गंभीर दुष्परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं लेकिन उनकी यह धमकी भी बेअसर साबित हो रही है। दरअसल जब डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अगवा करा कर वहां की चुनी हुई सरकार को अस्थिर कर दिया था तब नाटो ने इसका दबी जुबान से विरोध किया था। उस समय अपनी ताकत के नसे में चूर डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय देशों की जमकर बेइज्जती की थी। जिसे वे भूले नहीं है यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप के अनुरोध को उन्होंने ठुकरा दिया है।
खुद को दुनिया का बेताज बादशाह समझने वाले डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है कि कोई भी देश उनके मदद के लिए आगे ही नहीं आ रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिका और इजराइल दोनों ही अलग बलग पड़ गये हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से पंगा तो मोल ले लिया है लेकिन अब वे संघर्ष विराम के लिए मरे जा रहे हैं किन्तु ईरान ने साफ कह दिया है कि यह जंग अमेरिका ने शुरू की थी और इसे खत्म ईरान करेगा। ईरान के पास अभी भी बैलेस्टिक मिसाइलों का और डोनों का इतना बड़ा जखिरा है कि वह छह माह तक जंग लड़ सकता है।
ईरान में अमेरिका के सामने यह शर्त रख दी है कि अमेरिका खाड़ी देशों से अपने सैनिक अड्डे हटाये और इस जंग में ईरान को जो भी नुकसान हुआ है उसकी अमेरिका भरपाई करें तथा भविष्य में उस पर कभी युद्ध न थोपे और इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाया है। इनमें से एक भी शर्त को मानने का सीधा सा मतलब यह होगा कि अमेरिका ने हार मान ली है। जाहिर है। ईरान की ये शर्तें अमेरिका को हरगिज कबूल नहीं होगी और यह जंग अभी पता नहीं और कितने समय तक जारी रहेगी।



